मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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जिन्दगी का सौन्दर्य है, रूठना

Gaurav Saxena

 

रूठना जरूरी है..................


जिन्दगी का सौन्दर्य है, रूठना


रूठना भी एक कला है, हर कोई रूठा है। देखादेखी अब तो वो भी रूठ गये है, जो जीवन को सांसारिक मोह माया बता रहे थे। उन्हे अब क्या चाहियें जो रूठे बैठे है। कितना रूठा जायें और कब तक रूठा जायें इसके क्या मापदण्ड है इस पर अभी शोधकार्य चल रहा है। आखिर रूठनें का भी तो कोई मापदण्ड होना चाहियें। चपरासी बाबू से, बांट तराजू से, नौकर मालकिन से, सास बहू से, किचिन महंगाई से, बच्चे किताब से, किताब प्रकाशक से रूठी बैठी है। हर कोई किसी न किसी से रूठा बैठा है। रूठना अब फैशन बन चुका है या यूं कहे कि जिन्दगी का सौन्दर्य बन गया है। तभी तो घर की सुन्दरी मुदरी (अंगूठी) के लिए रूठी बैठी है जो आजकल कोपभवन में निवासित है। कोपभवन से याद आया कि रानी कैकई भी तो राजा दशरथ से रूठी थी, लेकिन उनके रूठनें का फल सम्पूर्ण जगत के लिए कल्याणकारी हो गया था। लेकिन सुन्दरी का रूठना कितना कल्याणकारी होगा यह तो समय रहते ही पता चलेगा। किसी के लिए रूठना कल्याणकारी हो रहा है तो किसी के लिए हानिकारक हो रहा है।


इस बार तो शर्मा जी भी अन्य कवियों की बातों में आकर रूठ बैठे और अपना इकलौता अवार्ड सरकार को वापस दे बैठे, बेचारे गहरी मात खा बैठे। सरकार है कि अब वापस ही नही दे रही है। बेचारे शर्मा जी अवार्ड की फोटो भी न खींच पायें जो कम से कम सोशल मीडियां में तो वाह-वाही करा देती। उधर मुंगेरी लाल भी दुखी है वह रूठा तो नही है लेकिन उससे कोई न कोई हर साल रूठ जाता है जिससे बेचारा हर साल कुंवारा ही रह जाता है। कहीं बेचारें के फूफा जी तो कही मौसा जी और रही बची कसर जीजा जी रूठ कर पूरी कर देते है, जिसके फलस्वरूप मुंगेरी लाल को मिलता है तो सिर्फ कुंवारापन और आयु में बढ़ता एक नया वर्ष। लेकिन बेचारा करे भी तो क्या करें फूफा, मौसा और जीजा के बिना तो भुपन (विवाह) की कल्पना भी नही की जा सकती है।   


लेकिन मरता सो क्या न करता, इस बार मुंगेरी नें ठान ही लिया है कि

फूफा रूठे, मौसा रूठे, चांहे रूठे जीजा लाल।

दुल्हनियां संग नचेगा इस बार मुंगेरी लाल।।

सोचा न समझा पहुंच गया शहर में, जहॉ सब कुछ तो किरायें पर मिलता है। खरीददार की जेंब में गर्मी हो साहब, तो क्या कुछ नही मिल सकता है इस शहर में। खरीद लाया किरायें पर मौसा, फूफा और जीजा जी को। किरायें के रिश्ते तो वास्तविक रिश्ते से कहीं ज्यादा शादी में अपनापन बिखेर रहे है शायद इसी बात का रूपया लगा है। मंडप पर शान्ति से मुंगेरी को किरायें के जीजा कपड़ें पहना रहे थें तभी शान्ती नें मुंगेरी के असली जीजा को बुला लिया। शान्ती मुंगेरी की बहिन जो ठहरी। शान्ती कब अशान्ति के साथ हो गयी पता ही नही चला। पता चला तो बस मुंगेरी नें स्वयं को अस्पताल में पाया, पास में किराये पर खरीदें गये मौसा, फूफा और जीजा जी अपनें पेमेंट के लिए खड़े थें। असली जीजा फरार थें..... बेचारा मुंगेरी इस बार भी बिन दुल्हनियां के ही रह गया। 

 

व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 20 नवम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

रूठना जरूरी है..................


 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

Gaurav Saxena

 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

अस्पताल में आज अफरा-तफरी मची है, डॉक्टर से लेकर नर्स तक सभी परेशान है सभी के ऊपर नेताओं का प्रेशर है। आम आदमी की कोई नही सुन रहा है। सब बीबीआईपी मरीज की सेवा में जुटे है। आखिर यह बीबीआईपी मरीज कौन है और इसे क्या हुआ है।

 

काफी मशक्कत के बाद पता चला है कि मच्छरपुर के युवा नेता कट्टन नें किसी इन्सान को काट लिया है और इन्सान का जहरीला खून कट्टन मच्छर के अन्दर घुस गया है जिससे उसे भयंकर मलेरिया हो गया है। इसी को लेकर कट्टन के समर्थक नाराज हो गये है और अस्पताल में अपनें नेता के इलाज के लिए शोर- शराबा करनें लगें है। कट्टन के मलेरिया की खबर तो मानों जंगल में आग की तरह से फैल गयी है। देश के कोनें- कोनें में फैले मच्छर समुदाय में इन्सानों के प्रति आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। उधर कट्टन की स्थिति में कोई सुधार नही है। प्रेस रिपोर्टर और छुटभईया यूट्यूबर अस्पताल के गेट पर कट्टन के हेल्थ बुलेटन रिलीज होनें का इन्तजार कर रहे है। उन सभी का इन्तजार करना ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से अपनें पसन्दीदा अभिनेंता की नई फिल्म के रिलीज होनें का इन्तजार उनके फैंस को होता है। 

 

कुछ ही देर में वरिष्ठ डॉक्टरों के एक दल नें गेट पर आकर हेल्थ बुलेटिन जारी किया जिसमें बताया गया है कि कट्टन की स्थिति में कोई सुधार नही है उसे खून की सख्त जरुरत है, खून का जल्द इन्तजाम न हुआ तो उसकी जान भी जा सकती है। उसे O positive खून की जरूरत है। लेकिन प्रश्न यह है कि मच्छरों की जाति में तो सभी का खून मिश्रित होता है क्योकि सभी बिना किसी भेंदभाव के हर ब्लडग्रुप के इन्सानों का खून पीते है। तभी तो इनके ब्लड ग्रुप लम्बे – लम्बे होते है जैसे ABCOO+ इत्यादि।

 

O+ ग्रुप का खून तो कोई इन्सान ही दे सकता है लेकिन इस समय तो इन्सान और मच्छरों के बीच तनातनी बनी हुयी है। अब भला इन्सानों से कोई मच्छर कैसे खून मांगे। इन्सानों से बदला लेनें के लिए गॉवों से टैक्टरों में भर- भर के मच्छरों का दल अस्पताल में आ रहा है। सभी मच्छर अपनें नेता के स्वास्थ्य के लिए अस्पताल में दुआयें कर रहे है तथा मौका मिलते ही इन्सानों पर आक्रमण करके अपनी शक्ति का प्रर्दशन भी कर रहे है। यहीं कारण है कि अस्पतालों में आज इन्सानों से ज्यादा मच्छर भनभना रहे है। इन्सान अपना मुंह छिपाकर घूम रहा है।
 

तभी मच्छरों के एक दल नें कोर्ट में दलील दी है कि इन्सानों का खून यदि दिनों-दिन इतना जहरीला होता गया तो आगे क्या होगा। हम मच्छरों का तो अस्तित्व ही मिट जायेगा। यदि समय रहते इस पर ध्यान नही दिया गया तो समाज में चारों तरफ जहर ही जहर फैल जायेगा और हम मच्छरों से कहीं ज्याद खतरा तो स्वयं इन्सान को इन्सान से होगा। मच्छरों की दलील का जबाब खोजा जा रहा है लेकिन कट्टन के लिए O+ ब्लड डोनर का मिलना अब नामुकिन ही लग रहा है। लग रहा है अब दुआ ही दवा का काम करेगी।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र " देशधर्म" नें अपनें दिनांक 13 नवम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

 

 

रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश

Gaurav Saxena

 रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश

वह कहनें को तो मात्र एक धागा है लेकिन वह एक अटूट बन्धन है प्रेम, वात्सल्य और सम्मान का। इसी धागे को हर वर्ष बहिनें अपनें भाई की कलाई पर बांधती है तो भाई अपनी बहिन को उसकी रक्षा हेतु बचन देता है और यह खास दिवस रक्षाबन्धन कहलाता है और कलाई पर धागे के रूप में बंधा प्यार भाई –बहिन के प्रेम को नित्य मधुरम बनाता है। माना कि आधुनिकता नें इस पर्व के भी मायनें बदले है लेकिन इसे ईश्वरी अनुकम्पा और भारतीय संस्कारों की शक्ति ही कहेगे कि इस पर्व का मूल स्वरूप यथावत बना हुआ है।

बहिनों का भाईयों के प्रति प्रेम औऱ विश्वास अति प्राचीनकाल से चला आ रहा है। इसका जिक्र रामायणकाल में भी देखनें को मिलता है। जब लंकापति रावण अशोक वाटिका में माता सीता से बात करनें जाता था तो माता सीता अपनें और रावण के मध्य में तिनके को रख कर रावण से निर्भय होकर वार्तालाप करती थी। और रावण को चेतावनी देकर कहती थी कि हे दुष्ट राक्षस यदि तुझमें इतनी सामर्थ है तो इस तिनके को पार करके दिखा। लेकिन वास्तव में रावण में इतना सामर्थ था ही नही कि वह इस तिनके को पार कर सकें। क्योकि तिनका भूमि से पैदा होता है इसलिए इसे भूमिज कहा जाता है और माता सीता का जन्म भी भूमि से हुआ है जिस कारण से माता सीता का एक नाम भूमिजा भी पड़ा है। इसप्रकार से तिनका माता सीता का रिश्ते में भाई हुआ। और माता सीता को अपनें भाई पर पूर्ण विश्वास था कि उसके भाई के रहते दुनियां का कोई भी रावण सीता का बाल भी बांका नही कर पायेगा। भाई के प्रति माता सीता का विश्वास अटूट था जो कि वन्दनीय एवं अनुकरणीय है।
इस रक्षाबन्धन पर ईश्वर सभी बहिन-भाईयों की रक्षा करें और भाईयों के प्रति बहिनों के विश्वास को निरन्तर बनायें रखे तथा भाईयों को चाहियें कि हर नारी जाति की को वह सम्मान दे और उनकी रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहें। तभी सच्चे अर्थो में यह पर्व अपनें उद्देश्य को पूर्ण कर सकेगा।

 
लेखक
गौरव सक्सेना


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "वेलकम इंडिया" नें अपनें 12 अगस्त 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 
रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश




बचत की भावना - व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena


 बचत की भावना
बचत की भावना - व्यंग्य लेख

गर्मी की छुट्टियों में एक अति कन्जूस पति नें अपने रूपयें बचानें के उद्देश्य से अपनी पत्नी को बच्चों सहित मायके भेज दिया, और नित्य प्रतिदिन कंजूस यह सोचकर खुश होता कि उसके रूपयों की खूब बचत हो रही है तथा सभी प्रकार के खर्चो से वह कुछ समय के लिए मुक्त है। तथा कंजूस स्वयं भी एक समय ही भोजन करता। रात्रि को खाना न बनाना पड़े इसलिए पानी पीकर ही सो जाता और यदि कभी ज्यादा भूख सताती तो किसी यार दोस्त के घर चला जाता औऱ वहॉ से पेट भरकर चला आता।

एक दिन कन्जूस को याद आया कि अपनें बच्चों औऱ पत्नी की खबर ले आखिर उनके क्या हाल- चाल है। तो उसनें अपनी पत्नी को एक पत्र लिखा –

हे मेरी प्राण प्रिय, कैसी हो बाल बच्चे कैसे है। तुम्हारे मायके जानें के बाद से तुम्हारी व बच्चों की याद मैं तो कोई कमी नही आयी है लेकिन घर के मासिक खर्चे में जरूर कमी आयी है। मैनें तुम्हारे जानें के बाद पूरें 6000 रू की बचत कर ली। मैं ग्रीष्मकालीन छुट्टियों से बहुत खुश हूं और बच्चों से कई गुना अधिक इन छुट्टियों की मुझे खुशी है क्योकि यह छुट्टियॉ आम आदमी के अन्दर एक बचत की भावना को जन्म देती है और बचत करनें का एक सुअवसर प्रदान करती है।

प्रिय, मैं तुम्हे बताता चलूं कि तुम एक भाग्यशाली पत्नी हो जिसें मेरे जैसा पति मिला है जो पत्नी को बिना किसी रोकटोक के मायके भेजनें के लिए सदैव तत्पर रहता है। तुम बच्चों की छुट्टियों के अतिरिक्त भी वर्ष में कभी भी मायके जा सकती हो इसमें मेरी पूर्व से ही स्वीकृति है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि पूर्व की भांति इसबार भी तुम पूरी छुट्टियॉ व्यतीत करनें के बाद ही घर वापस आओगी और एक नयी उर्जा के साथ घर परिवार को चलाओगी।

शेष मिलनें पर...... तुम्हारा पतिदेव

 

उधर जैसे ही पत्नी को अपनें कंजूस पति का पत्र मिला उसनें तुरन्त लौटती डाक से उत्तर भेजा कि आपके पत्र को मेरे भाई नें मुझसे पूर्व ही पढ़ लिया है। और वह आपकी बचत की भावना से अति प्रभावित हुआ है। इसी भावना से प्रेरित होकर वह शेष एक माह की बची बच्चों की छुट्टियों को यादगार बनानें के लिए मेरे साथ सपरिवार आपके यहॉ पधार रहे है। अपनें परिवार के साथ- साथ मेरे भाई के परिवार की खातिरदारी के लिए आप पूरी रूपरेखा बनायें ताकि मेरे भाई के परिवार की छुट्टियॉ आनन्दमय  व्यतीत हो सकें।

शेष मिलनें पर --- तुम्हारी प्राणप्रिय.......

पत्नी के वापसी पत्र को पढ़नें के बाद पति की हालत बिगड़ी, आनन फानन में जिला चिकित्सालय में भर्ती करवाया गया है। लेकिन अभी तक वह होश में नही आया है।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनि्क समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 26 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है।

बचत की भावना - व्यंग्य लेख



हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख

हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख


पूरे देश में योग दिवस की तैयारियां जोर- शोर से चल रही है। जोर से अभिप्राय है कि हर एक दुबला – पतला व्यक्ति अब जोर लगा कर श्वास को अन्दर बाहर खींचनें कर अभ्यास करनें लगा है ताकि योग दिवस पर वह अपनें योग का उत्तम प्रदर्शन कर सकें तथा शोर से अभिप्राय यह है कि अब बिना किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र के आम लोगो को योग के लिए मैदान पर दिशानिर्देश दियें जायेगे। शहर के अन्य महनीय लोगो की तरह मैं भी इस समय श्वास को जोर – जोर से अन्दर बाहर करनें का अभ्यास कर रहा हूं। क्योकि योग के जानकर बताते है कि यह सिर्फ करनें से होता है। इसलिए करना जरूरी है। मैनें अपनें चेला कनचप्पा को इस योग दिवस के लिए विशेष रूप में ट्रेनिंग दे रक्खी है कि पिछली बार चूंके सो चूंके लेकिन इस बार कोई चूंक नही होगी। योग दिवस पर मेरी योग करते हुयें फोटो सभी अखबारों की मुख्य हेडिंग होनी चाहियें। तथा योग करनें के बाद मैं एक स्वरचित कविता का काव्य पाठ करूंगा। जिसें सभी टी.बी. चैनल अपनें प्राईम टाईम में चलायेगे। मेरे दिशानिर्देश कनचप्पा के लिए कोई अध्यादेश से कम नही होते है। वह अब काफी समझदार हो गया है और उसनें मुझे आश्वस्त भी कर दिया है कि इस बार शहर में योग दिवस पर मेरा ही योग श्वास भरेगा। 

योग दिवस के दिन मैं सुबह तड़के ही अपनें चेला कनचप्पा के साथ योग करनें के लिए निकल पड़ा। मैदान पर जाकर देखा तो पता चला कि मुझसे पहले नेता जी नें मैदान को घेर रखा है औऱ मेरे बुलायें आदमी भी नेता जी की चिकनी चुपड़ी बातों में फसकर नेता जी के साथ बैठकर पेट फुला रहे है अर्थात योग कर रहे है। मैं इस प्रकार की अव्यवस्थता देखकर कनचप्पा पर क्रोधित होनें वाला ही था कि वह बोल पड़ा कि कविवर आप परेशान न हो। बगल वाला मैदान छोटा जरूर है लेकिन उसकी अपनी एक अलग महिमा है। इतिहास गवाह रहा है कि इस मैदान पर होनें वाले आयोजन कभी विफल नही हुयें है और रही बात भीड़ जुटानें की वह आप मुझ पर छोड़ दीजियें। मैं कनचप्पा की बात मानकर बगल वाले मैदान में योग करनें लगा, पता नही कनच्प्पा नें लोगो के कान में क्या मंत्र फूका की नेता जी की योग सभा से उठकर लोग मेरी योगसभा में आनें लगे। तभी कनचप्पा मुझसे बोला कि कविवर आप और तेज गति से श्वास लेकर जोर-जोर से योग करें तथा योग में कुछ करतब भी दिखायें जिससे बगल वाले नेता जी आपके सामनें योग में फीके पड़ जायें और आपकी जय-जयकार हो। मैनें भी अपनी पतली पसलियों को साधते हुयें जोर – जोर से श्वास अन्दर बाहर करना शुरू किया तो लोग तालियां बजानें लगे। फिर मैं करतब दिखानें के लिए सिर के भर उल्टा होकर शीर्षासन करनें लगा कि अचानक से मेरी पतली पसलियों नें धोखा दे दिया औऱ मैं भयकर दर्द से चिल्ला पड़ा। अचानक से मैं जमीन पर गिर पड़ा और फिर जब आख खुली तो स्वंय को अस्पताल में पाया। पास में डाक्टर, नर्स औऱ आंख छिपाता कनचप्पा खड़ा था। मैं कनचप्पा से कुछ बोलता इससे पहले ही उसनें मुझे एक अखबार में छपी खबर दिखायी जिस पर लिखा था कि हर किसी के वश का नही रहा योग। मैं कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता उससे पूर्व ही नर्स नें एक इंजेक्शन मेरी कमर में जड़ दिया। और मैं फिर दर्द में अपनी योग पर लिखी कविता गुनगुनानें लगा। आखिर गुनगुनानें से ही तो कविता कालजयी बनती है। 


लेखक 

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज,इटावा

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 19 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "अमर उजाला" नें अपनें 13 नवम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

योग की विवशता

 


आओं हम वृक्ष लगाये, धरती का श्रृगांर करायें।

Gaurav Saxena

 आओं हम वृक्ष लगाये, धरती का श्रृगांर करायें।


आओं हम वृक्ष लगाये, धरती का श्रृगांर करायें।

हरा भरा कर धरती का हम रूप रंग सजायें।।

बचे न नंगी धरती मृदा का स्वरूप निखारे।

वृक्षारोपण कर दुनियां को समृद्ध बनायें।।

आज सुधारे अपना तो कल भी बेहतर होगा।

वृक्षों की हरितिमा ही धन-दौलत का माध्यम होगा।।

चांह नही है दुनियां को, तो फिर पछताना होगा।

ले संकल्प हमको वृक्षों का संरक्षण करना होगा।।

शुद्ध प्राणवायु की खातिर जीवजन्तुओं को बचाना होगा।

तभी मिलेगी गहरी शान्ती पर्यावरण सन्तुलित रखना होगा।।

गर न चेते अभी फिर आक्सीजन लेकर चलना होगा।

ओजोन परत है ढ़ीली, बेमौसम से छुटकारा पाना होगा।।

अभी सुधर जाओं मित्रों वरना अफसाना ही होगा।

करे प्रतिज्ञा सच्चे मन से रोपण हमें करना होगा।।

आओं हम वृक्ष लगायें, धरती का श्रृगांर करायें।


कवि

जगत बाबू सक्सेना

सह सम्पादक

प्रज्ञा कुंभ



उक्त काव्य को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 12 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 


आओं हम वृक्ष लगाये, धरती का श्रृगांर करायें।


उजड़ते घरौदे

Gaurav Saxena

                                                उजड़ते घरौदे



दिनो-दिन जीव जन्तुओं, पशु- पक्षियों की घटती संख्या और उनकी बढ़ती समस्याओं के कारण जंगल के राजा नें एक बड़ी सभा का आयोजन किया है। समूचें जंगल में ढ़ोल की जगह कनस्तर को पीट कर सभा के आयोजन की सूचना दे दी गयी है। आज भारी संख्या में जीव-जन्तु तथा सभी पशु-पक्षी अपनी- अपनी समस्याओं को जंगल के राजा शेर के समक्ष रखेंगे। चिम्पू चिम्पांजी डायरी में एक- एक कर सभी के नाम लिख रहा है, सभी लोग अपनी बात रखनें के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रहे है। सभी के सभी घटते जंगल और मानवीय उपेक्षा से खासे नाराज है। उनकी नाराजगी का अन्देशा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि भूखा मिंकू बन्दर खिसियाकर बार-बार खाली पेड़ को ही झकजोर रहा है। वहीं लकड़बग्घा घूम-घूम कर सभी के लात मारकर चला जाता है। सबसे पहले गिरगिट को अपनी बात रखनें का अवसर मिला तो वह बेचारा रोते हुये बोला कि वह आत्महत्या कर लेगा क्योकि अब रंग बदलनें के मामले में वह इन्सानों से मुकाबला नही कर सकता है। पल-पल इन्सान इतना रंग बदल रहा है जिसकी कोई सीमा ही नही है। उसका अब इन्सानों के बीच कोई बजूद ही नही रहा। पनिहा सांप की बारी आनें पर उसनें कहा कि अब इन्सान उससे कहीं ज्यादा जहरीला हो गया है। एक बार सांप के काटे जहर का इलाज हो सकता है लेकिन इन्सान के जहरीले स्वभाव का इलाज तो अब असम्भव ही लगनें लगा है। तभी तो देखो समाज में दिनों- दिन कितना जहर घुलता जा रहा है। सभी नें हॉ में हॉ मिलायी। लोमड़ी की बारी आनें पर उसनें बताया कि चालाकी के मामलें में प्राप्त की गयी सारी डिग्रियों को उसनें यह कहकर जला दिया है कि इन्सानों के सामनें चालाकी के नाम पर केवल अपनी बदनामी करवानें से तो अच्छा स्वयं को अनपढ़ कहलाना है।



जंगल के राजा शेर भी घटते जंगल और बसते शहर के कारण खुद का घर बचानें में असफल थें लेकिन वह करे भी तो क्या करें, सभी को सांत्वना दे रहे थे कि जल्द ही वह सरकार तक सभी की बात पहुंचायेगे। और हम सभी की स्थिति जल्द सुधरेगी। कुत्तों के सरदार कट्टन नें अपनी बारी आनें पर बताया कि अब बफादारी और सुरक्षा से इन्सानों का उसके ऊपर से विश्वास उठ गया है। आज इन्सान सीसीटीवी कैमरा और सुरक्षा गार्डो पर आश्रित हो गया है। मिंकू बन्दर गुस्से में आग बबूला होकर शेर पर ही खिखियाकर बोला कि आप हाथ पर हाथ रखे बैठे है हम लोगो के लिए कुछ करते क्यो नही है। हमारे लिए अब बाग- बगीचे समाप्त हो गये है। इन्सानों नें छतो पर खानें की चीजे सुखाना तक बन्द कर दिया है। हम भुखमरी से मर रहे है, हमारे कोई खेती नही होती है, हम खाये तो क्या खायें...



शेर नें बड़ी मुश्किल से मिंकू को शांत किया तब जाकर कहीं मोर का नम्बर आया तो उसनें बताया कि आज का युवा नशे की हालत में फूहड़ गानों पर अश्लील नृत्य करनें लगा है।  भारतीय संस्कृति का मयूर नृत्य कहीं कलंकित न हो जायें इसलिए अब उसनें अपनें नृत्य का प्रदर्शन करना ही बन्द कर दिया है। 


तभी अचानक से भगदड़ मच गयी पता चला कि इन्सान बड़ी- बड़ी मशीनें लेकर इसी जंगल की ओर आ रहे है, अब यह जंगलों की अन्धाधुन्द कटान हम सभी जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों का घरौदा उजाड़ देगा। सभी बेचारे अपनें प्राण बचाकर इधर उधर भांगनें लगे।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

354 करमगंज,इटावा


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 12 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। तथा अमर उजाला समाचार पत्र नें देश के अपनें सभी संस्करण में दिनांक 19 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 


उजड़ते घरौदे

उजड़ते घरौदे


संवारे अपना कल

Gaurav Saxena

 संवारे अपना कल

संवारे अपना कल


मनुष्यों को पूर्वकाल से सजने और सवरनें का शौक रहा है। जिसके लिए वह निरन्तर प्रयासरत भी है। ठीक ऐसे ही प्रयास हमे धरनी को सजानें औऱ सवारनें के लिए करना चाहियें। धरती का श्रृंगार उसकी हरितिमा होती है। हरे भरे वृक्ष, स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित वातावरण, वन्य सम्पदा का सरंक्षण और संवर्धन ही धरती का श्रृंगार होता है। परन्तु अफसोस है कि मानव पर्यावरण के प्रति गम्भीर नही है। वनों का अन्धाधुन्ध कटान, हरे भरे वृक्षों का दोहन, वन्य जीवों का शिकार, विलुप्त हो रही प्रजातियों के प्रति उदासीनता और फैलता प्रदूषण आज के समय की एक बड़ी चुनौती बनी हुयी है। जिस पर यदि समय रहते हमनें ध्यान नही दिया तो नि:सन्देह इसके दूरगामी परिणाम बहुत घातक सिद्ध होगे। और फिर हमारे पास केवल अफसोस करनें के अतिरिक्त कुछ भी शेष नही रहेगा। 

निरन्तर हरितिमा कम होनें से शुद्ध प्राणवायु का मिलना भी दुर्लभ होगा। और वह दिन भी दूर नही रहेगा जब हम अपनी पीठ पर प्राणवायु हेतु ऑक्सीजन का सिलेण्डर लेकर चलेगे। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की एक भारी सजा मनुष्यों को चुकानी पड़ेगी। बताते चले कि चेन्नई देश का एक ऐसा शहर बन चुका है जहॉ भूमिगत जल पूर्णतया समाप्त हो चुका। बिन जल के जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है। एक समय ऐसा था जब चेन्नई में जल के पर्याप्त संसाधन थें लेकिन अन्धाधुन्ध वृक्षों के कटान और कंक्रीट से पटते जंगल नें आज चेन्नई को इस स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया है। 


शहर दर शहर हम पर्यावरण असन्तुलन की ओर बढ़ते ही जा रहे है। लेकिन समय रहते चेतना भी नितान्त आवश्यक है। क्योकि प्रकृति को संरक्षित कर ही हम अगली पीढ़ी तक ले जा सकते है। हमारी आगे आनें वाली पीढ़ियां तभी सुरक्षित हो पायेगी जब हम अपनें आज को संरक्षित करेगे। पर्यावरण सन्तुलन की दिशा में हमें अत्याधिक पौधारोपण को अपनाना होगा तथा पौधारोपण के बाद उनकी देखभाल औऱ सुरक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा। स्वच्छ वातावरण के लिए बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगानी होगी।




युवा लेखक एंव सामाजिक कार्यकर्ता

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज,इटावा


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "वेलकम इंडिया" व "दैनिक जागरण" नें अपनें 06 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

संवारे अपना कल


मौन की महिमा - व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 

 

मौन की महिमा - व्यंग्य लेख

मौन की महिमा - व्यंग्य लेख

स्वयं को व्यस्त दिखाना भी एक कला है जो इसमें पारंगत है सच्चे अर्थो में वही जिन्दगी के मजे ले रहा है। बाकी तो सब मोह माया है। सरकारी दफतर में तो व्यस्तता इतनी दिखायी पड़ती कि लगता है कि बाबू जी लघुशंका के लिए भी नही जाते होगे। उनसे कुछ भी पूछो तो जबाब ही नही देते है। शायद मुख में भरे पानरस को समय से पूर्व मुक्त नही करना चांहते होगे या फिर अस्त व्यस्त रहकर व्यस्तता का सर्टीफिकेट नि:शुल्क प्राप्त कर रहे होगे। आपको बताते चले कि अब इस व्यस्तता का एक नया रूप भी दिखायी दे रहा है जो कि मौन रूप है। जिसमें मौन रहा जाता है। या ज्यादा जरूरत होनें पर केवल गर्दन और हाथ हिलाकर सांकेतिक भाषा के द्वारा ही दूसरे व्यक्ति को जबाब दिया जाता है। सरल शब्दों में हम कह सकते है कि व्यस्तता ही मौन की जननी है।

अब यह मौन रूपी नवीन गुण सरकारी दफतरों से होता हुआ बाजार, सब्जी मण्डी औऱ ऑटो चालकों तक पहुंच गया है। इसमें कोई बुरायी भी नही है नया गुण है तो प्रचार प्रसार तो लाजमी है। पुष्टि करनें के लिए अबकी बार जब आप सब्जी मण्डी जायें तो देखना कि व्यस्त न होते हुये भी आपके कितनी बार आलू का भाव पूछनें के बाद भी दुकानदार नें आपको जबाब नही दिया होगा और आप गुस्से में आगे बढ़ गये होगे। यही हाल तो बाजार का है कई बार सामान का मूल्य पूंछने के बाद जाकर कहीं आपको मूल्य बताया जाता है। कुछ जागरूक ग्राहको नें जब दुकानदारों से उनके इस प्रकार के नये व्यवहार के बारे में पूछा तो पहले तो कुछ दुकानदारों नें इस गूढ़ रहस्य को उदघाटित करनें से मना कर दिया तो कुछ नें सिर्फ इतना बताया कि व्यस्त रूपी मौन व्यवहार ट्रेंड में चल रहा है। इसलिए हम सभी इसे अपना रहे है। लेकिन छुट्टन टैक्सी ड्राईवर जो कि नया नया टैक्सी मालिक बना है, बेचारा कल ही इस ट्रेंड के चक्कर में मात खा गया। एक सवारी नें ऑटो इधर आना की आवाज रेलवे स्टेशन के गेट से लगायी, लेकिन छुट्टन अपनी व्यस्तता दिखानें के चक्कर में आभासी व्यस्तता का चोला ओढ़े था। उसनें आवाज को जानबूझ कर अनसुना कर दिया और दोबारा ग्राहक द्वारा बुलाये जानें की प्रतीक्षा करनें लगा। लेकिन आवाज दोबारा नही आयी औऱ जब उसनें पलटकर सवारी की ओर देखा तो पाया कि सवारी उसके गुरू कल्लन के ऑटों में बैठ चुकी थी। तब से बेचारा छुट्टन बार बार रेलवे पूछताक्ष खिड़की पर जाकर अन्य गाड़ियों के आनें के समय को पूछ रहा है। लेकिन गाड़ियां या तो रवाना हो चुकी है या फिर कई घन्टो की देरी से आयेगी। बेचारा गर्मी में सवारियों के इन्तजार में झुलसा जा रहा है।  

यह मौन की महिमा महान है जो मौन है वह महान है। इस मौन महिमा से जो सुख प्राप्त होता है उसका बखान मेरे जैसा साधारण मानव तो कर नही सकता है, इसका बखान तो सिर्फ मौनी बाबा ही कर सकते है।

 

लेखक

गौरव सक्सेना 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "वेलकम इंडिया" नें अपनें 30 मई 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

मौन की महिमा - व्यंग्य लेख

 
मौन की महिमा - व्यंग्य लेख

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र देश धर्म ने भी अपने 05 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है।

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