मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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गणतंत्र की अमर कहानी

Gaurav Saxena

 

गणतंत्र की अमर कहानी

गणतंत्र की अमर कहानी

मैं भारत का वीर सिपाही तिरंगा लेकर निकला हूं।

जात-पात और भाषा का दंश मिटानें निकला हूं।।

मजहब की बन्दिश तोड़, हर एक को गले लगानें निकला हूं।

वीर शिवाजी, लक्ष्मीबाई, भगत सिंह की याद दिलानें निकला हूं।।

                     मैं भारत का वीर सिपाही तिरंगा लेकर निकला हूं।

बापू के सत्य अंहिसा का पाठ पढ़ानें निकला हूं।

विदेशी सामानों का बहिष्कार कर स्वदेशी अपनानें निकला हूं।।

खूब पढ़ो और खूब बढ़ो, नारी शिक्षा की अलख जगानें निकला हूं।

गांधी तेरे चरखे की रफ्तार बढ़ानें निकला हूं।।

                     मैं भारत का वीर सिपाही तिरंगा लेकर निकला हूं।

सत्तावन की छिड़ी लड़ाई, जलियांवाले नरसंहार की व्यथा सुनाने निकला हूं।

यह शुभ दिन है हम सबका इसका इजहार करानें निकला हूं।।

गणतंत्र महापर्व है भारत का, इसका जश्न हर दिल में मनानें निकला हूं।

खुशहाल हो हर भारतीय, सबको अपना अधिकार दिलानें निकला हूं।।

                       मैं भारत का वीर सिपाही तिरंगा लेकर निकला हूं।

 

कवि

जगत बाबू सक्सेना

सह सम्पादक 

प्रज्ञा कुु्ंभ

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र देशधर्म नें अपनें दिनांक 23 जनवरी 2022 के अंक में प्रकाशित किया है।  

गणतंत्र की अमर कहानी


तिरंगे की शान....

Gaurav Saxena

 

तिरंगे की शान....

तिरंगे की शान....

 

आज सड़क पर अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा चहल- पहल है। कुछ बच्चें प्रभात फेरी निकाल रहे है। हर कोई देशभक्ति के गीत गुनगुना रहा है। कमला नें अपनें 8 वर्षीय बेटे आजाद को कागज से बनें तिरंगे झण्डे दियें और कहा बेटा जाओ अच्छे से बेचना, जब तिरंगे बिक जायें तो मेरे पास आकर और ले जाना। मैं फुटपाथ पर और सामान बेचूंगी। लेकिन मॉ आज क्या है और यह तिरंगे आज ही के दिन लोग क्यो खरीदते है। बेटा ज्यादा तो मुझे भी नही पता है बस यह समझ लो कि आज के दिन हम पूरी तरह से स्वतन्त्र थें और आज के ही दिन हमारा अपना कानून बना था। .यह क्या बोल रही है मॉ ..... मुझे कुछ समझ नही आ रहा है। अरे बेटा मैं किसी पढ़े लिखे बाबू साहब से पूछ कर तुझे बाद में बता दूंगी। तू जल्दी से तिरंगे बेच...... 2 रू का एक तिरंगा है... ध्यान से बेचना। कुछ पैसे आ जाये तो तेरे बापू की दवा आ जायेगी।

ठीक है मॉ.....  

बाबू जी, तिरंगा ले लो ...... ले लो बाबू जी..... आजाद जनवरी की कड़ाके की सर्दी में तिरंगा बेच रहा है। लेकिन खरीददार तो कार के शीशे तक को नीचे नही उतार रहे है। हर कोई मानों तिरंगे को अन्देखा कर रहा हो।

तभी चौराहे से गुजरती लोगो की भीड़ नें आजाद का ध्यान भंग किया। सभी लोग जोर – जोर से नारे लगा रहे थें। भारत माता की जय..... भारत माता की जय....... आजाद नें भी नारों की आवाज में अपनी आवाज मिलायी। तो कुछ लोगो नें आजाद से चलते – चलते कहा कि तुम यहॉ क्या बेच रहे हो। उधर रामलीला मैदान पर पहुंचो नेता जी आनें वाले है नास्ता पानी मिलेगा।

बेचारा भूखा प्यासा आजाद अपनें तिरंगो के साथ रामलीला मैदान के एक किनारे खड़े होकर तिरंगे बेचनें की भरकस कोशिश करनें लगा। लेकिन किसी नें एक भी तिरंगा नही खरीदा। नेता जी का जोरदार स्वागत हुआ और फिर नेता जी नें एक लम्बा भाषण दिया औऱ तिरंगे की आन बान शान में एक कविता भी पढ़ी और अन्त में नेता जी कहा कि हम सभी को तिरंगे का सम्मान करना चाहियें उसी की शान में हमारी शान है। हमें हर हाल में तिरंगे की शान को बनाये रखना होगा। आजाद तल्लीनता के साथ नेता जी की बातो को सुन रहा था। कुछ ही देर में मंच से उतर कर नेता जी चल दियें और पीछे चल दिया नेता जी का काफिला......

तभी अचानक से आजाद को नेता जी में अपना एक धनवान ग्राहक नजर आया। तो लपक कर लोगो की भीड़ को चीरता हुआ नेता जी की कार के पास पहुंचा और नेता जी से बोला ...साहब मेरे तिरंगे को खरीद लो.... सुबह से बिक्री नही हुयी है। चार पैसा कमा लेगे तो बीमार पिता की दवाई आ जायेगी। नेता जी शायद कुछ बोलते पीछे से एक जोरदार धक्का आया और आजाद धड़ाम से गिर पड़ा। नेता जी का काफिला निकल पड़ा। और आजाद जमीन पर पड़ा अपनें सीनें से तिरंगो को चपेटे था। आजाद तो घायल हो गया था लेकिन उसनें तिरंगे की शान में कोई कमी नही आनें दी। सभी तिरंगे सुरक्षित थें। क्योकि नेता जी कहा भी था कि हमें हर हाल में तिरंगे की शान बनाये रखना होगा।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र देश धर्म नें अपनें 23 जनवरी 2022 के अंक में प्रकाशित किया है।

तिरंगे की शान....


 

सशक्त सरकार चुनकर के बड़ा एक काम कर देना........

Gaurav Saxena

 

 

सशक्त सरकार चुनकर के बड़ा एक काम कर देना........

सशक्त सरकार चुनकर के बड़ा एक काम कर देना........

 

अपनें मत को यूं ही, बर्बाद न कर देना।

बहकावे में आकर, किसी के भूल न कर देना।।

सोचना समझना, परखकर सरताज बना देना।

वादे निभाये आपसे जो, वहीं सरकार बना देना।।

 

दादा – दादी, काका – काकी, सब साथ दे देना।

सहज कर अपना समय, लोकत्रंत के नाम लिख देना।।

मतदान के महापर्व को, अब सफल बना देना।

सशक्त सरकार चुनकर के, बड़ा एक काम कर देना।।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

उक्त कविता को अमर उजाला नें अपनें काव्य स्तम्भ में शामिल किया है। 

अमर उजाला काव्य लिंक 

खोखली ईमानदारी

Gaurav Saxena

 

खोखली ईमानदारी

खोखली ईमानदारी

 

राधा हर शाम बाजार में ताजी तरकारी बेचनें के लिए जाती है और देर रात तक बाजार में इस उम्मीद में बैठी रहती है कि सारी तरकारी बिक सके जिससे घर का खर्चा सही से चल सकें, लेकिन हर रोज तरकारी बिकनें से रह जाती है और उदासी लेकर राधा घर वापस चल देती है। बाजार में अन्य सभी दुकानदार के पास अपनी पक्की दुकान और प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था है, जिस कारण से अपेक्षाकृत अधिक ग्राहक ऊंची दुकान पर जाना पसन्द करते है भले ही उनके पकवान फीके ही क्यो न हो। वहीं राधा फुटपाथ पर बिछौना बिछा कर मोमबत्ती के प्रकाश में देर रात तक तरकारी बेचती रहती है। लेकिन ठन्डी हवा के थपेड़े बार- बार मोमबत्ती को बुझा देते है और हर बार राधा मोमबत्ती जलाकार मानों हवा को ही मात दे रही हो। 

 

मन्द प्रकाश में काम करनें के कारण अब उसकी नैत्र ज्योति भी कम हो गयी, अस्पताल में दिखाया तो आंखो पर चश्मा लगा दिया गया। और कम प्रकाश में काम करनें से मना कर दिया गया। अब फुटपाथ पर रात्रि में प्रकाश की कैसे व्यवस्था हो, यह एक बड़ी समस्या राधा के सामनें खड़ी थी। लेकिन कभी न हार माननें वाली राधा नें पास के एक घर के मालिक से बात की और अपनी समस्या बतायी तो मकान मालिक ने कई शर्तो के साथ उसे 2 घन्टे के लिए बिजली का एक बोर्ड अपनें घर से जोड़नें की अनुमति दे दी, जिसके लिए उसनें मासिक भुगतान समय से अदा करनें की भी हिदायत दी। बेचारी राधा नें सिर्फ एक बल्ब जलानें की स्वीकृति भर कर अपने बैठनें के स्थान को रोशन कर लिया। 

 

इस तरह से रोज रात्रि में बल्ब के प्रकाश में बैठकर तरकारी बैचनें का काम चल रहा था। लेकिन एक दिन राधा का मोबाइल चार्ज न होनें के कारण बन्द हो गया तो उसनें उसी बिजली के बोर्ड में मोबाइल चार्जर लगा कर फोन चार्ज करना शुरू  ही किया था कि मकान मालिक की पैनी नजर उसपर पड़ी और मकान मालिक आकर के आग बबूला होनें लगा। कि तुमनें एक ही बल्ब जलानें की बात कही थी, और अब चोरी से मोबाइल भी चार्ज कर रही हो। तुम्हे पता है कि यह एक चोरी है, बिजली चोरी.... आखिर ईमानदारी भी कोई चीज है या नही। अब मैं तुम्हे बिजली नही दूगां, तुम और कहीं से अपनी व्यवस्था करो। बेचारी राधा गिड़गिड़ानें लगी.... बोली साहब बिजली न काटों, घर पर मेरा बच्चा बीमार पड़ा है उसी के हाल जाननें के लिए फोन करना था। इसलिए चार्ज कर रही थी। अब एक बल्ब के अतिरिक्त कुछ भी आपकी बिजली से नही चलाऊंगी। मालिक बड़बड़ाता हुआ अपनें घर के अन्दर चला गया। 

 

दूसरे दिन जब शाम को राधा नें फुटपाथ पर अपना बिछौना लगाकर तरकारी सजायी और बिजली का प्लग लगानें के लिए मालिक के दरवाजे पर आवाज लगायी तो अन्दर से कोई आवाज नही आयी, काफी देर दरवाजा खटखटानें के बाद घर की नौकरानी बाहर आयी और उसनें बताया कि साहब को पुलिस पकड़ कर ले गयी है। तो राधा नें कारण पूछा तो नौकरानी नें बताया कि बिजली विभाग के लोगो नें रात्रि में साहब को पकड़ लिया। लेकिन क्यो... राधा नें पूछा.... 

 

नौकरानी नें कहा कि वह हर दिन रात्रि को घर के पीछे लगे बिजली के पोल से चोरी करके बिजली जलाते थे, और सभी से ईमानदारी की बाते करते थें। कल रात्रि में उन्हे रंगे हाथों पकड़ लिया गया। पूरे घर की बिजली काट दी गयी है। सुना है कि उन पर कड़ी कार्यवाही हो रही है।

 

बेचारी राधा वापस आकर तरकारी बेचनें लगी और शायद सोच रही थी कि ईमानदारी का पाठ पढ़ानें वाले स्वंय अन्दर से कितनें बेईमान होते है। अब राधा किसी और ईमानदार मालिक की तलाश में थी जो उसे किरायें पर दो घन्टे के लिए बिजली दे सके।

लेखक

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज, इटावा

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र वेलकम इंडिया नें दिनांक 08 जनवरी 2022 के अपने अंक में प्रकाशित किया है। 

तथा दैनिक समाचार पत्र देशधर्म नें दिनांक 09 जनवरी 2022 के अपनें अंक में प्रकाशित किया है। 

खोखली ईमानदारी


नुमाइश की रंग – बिरंगी दुनियां

Gaurav Saxena

नुमाइश की रंग – बिरंगी दुनियां


मेलों का आम जीवन में बहुत महत्व रहा है। कभी किसी शहर का मेला तो कहीं किसी शहर की नुमाइश । मेला जब बाल्यावस्था से बड़ा हो जाये तो उसे नुमाइश या प्रदर्शनी जैसे शब्दों में बांध दिया जाता है। मेलों का अपना एक अलग रंग और ढ़ग होता है, इसी कारण से लोग मेलों के आयोजन के लिए बेसब्री से इन्तजार करते रहते है। हर एक मेला अपनी किसी खास चीज या फिर कोई खास कारण के लिए प्रसिद्ध होते है। नुमाइश जहॉ अन्य शहरों से दुकानदार अपने हुनर को दिखानें के लिए आते है, कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करनें के लिए आते है। यह नुमाइश प्रशासन के द्वारा निर्धारित समय के लिए एक बड़े स्थान पर लगती है और तब तक नही हटती जब तक कि पुलिस अपना बल न दिखायें। खरीददार भी साहब उठती नुमाइश का इन्तजार बड़ी बेसब्री से करते है क्योकि यहीं उपयुक्त समय होता है जब हर माल 5 रू बिकता है। माल कितना बिकता है या फिर धीमें से भीड़ की आड़ में चुरता है यह तो ऊपरवाला ही जानता है। सामान का भाव तो इतना गिर जाता है जितना कि सेन्सेंक्स भी नही गिरता है। लोग थैला भर- भरकर घर ले जाते है।

नुमाइश की छटा में विविध रंग भरे होते है, कहीं जलेबी वाला नई- नई उपमायें दे रहा है तो कोई इशारे ही इशारो में बच्चों से खिलौनें की जिद्द करनें के लिए उकसा रहा है तांकि बच्चा रोये और दुकनदार का खिलौना बिक सकें। बच्चा भी इशारे पर रोता है और बेचारे मॉ – बाप को जिद्द पूरी करनी पड़ती है। और उधर खोये – पाये बच्चों के लिए लाउडस्पीकर पर विज्ञापन और संगीत के बीच- बीच में सूचनायें दी जाती है कि अपनें बच्चे को आकर ले जायें यह लाल रंग के कपड़े पहनें है। अब आपके लिए यह भले ही हास्यापद लगे कि कुछ लोग तो जानबूझ कर बच्चों को नुमाइश में खो देते है कि देख रेख के लिए खोया – पाया विभाग बना ही है, घर चलते समय वहॉ से बच्चों को ले लेगें। नुमाइश देखनें के दौरान हर चीज पर मचलते बच्चों को डमी रूप में खोकर आराम से नुमाइश देखनें का अपना एक अलग ही अनुभव होता है। बीच – बीच में फरमाईशी गीत, मोलभाव करते लोग, तरह – तरह के जायकों का लुफ्त, हर साल कुछ न कुछ नया मिलना अपनें आप में अदभुत है। वहीं मेदे से खास तरीके से बना हुआ “खाजा” जिसे हर दुकानदार आपकों इस उद्देश्य से चखाना चाहंता है कि आप उसकी दुकान से खाजा खरीदें। लेकिन लोग भी है जो केवल फ्री में हर दुकान से स्वाद चखकर मन और पेट दोनों भरना चाहंते है। तब दुकानदार भी करे तो क्या करें वह भी तैयार बैठा तेल में से तिली निकालनें के लिए...... आपमें से कोई तो स्वाद के साथ- साथ खरीददारी भी करेगा। हमारे गॉव का छुट्टन हर साल गॉव वालों को शहर में लाकर के नुमाइश दिखाता है, सॉफ्टी की दुकान पर सभी लोगों को बैठा जाता है और दुकानदार से कहता है कि सभी लोगो को सॉफ्टी खिलाओ और पेमेन्ट के समय पर दबे पैर खिसक जाता है। दुकनदार हर साल छुट्टन को ढूढ़ता रहता है।

क्या बच्चा, क्या जवान और वृद्ध सभी खुश है इस नुमाइश की चकाचौध दुनियां में। आप भी लुफ्त लीजियें सर्द रातों में मूगफली चबते हुयें नुमाइश का दीदार करनें का।

 लेखक

गौरव सक्सेना 


उक्त लेख को समाचार पत्र देशधर्म नेें अपनें 2 जनवरी 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

नुमाइश की रंग – बिरंगी दुनियां


व्यंग्य लेख – बड़ी बातों की सजा

Gaurav Saxena

 व्यंग्य लेख – बड़ी बातों की सजा



मैं रविवार की सुनहरी दोपहर का आनन्द अपनी बालकनी में बैठकर ले रहा था। कड़ाके की सर्दी नें कई दिनों से आम जनमानस की हालत खराब कर रक्खी थी। हालत तो हम कवियों की भी खराब ही चल रही है। क्योकि इस वर्ष भी कोरोना नें अपना खूब दमखम दिखाया जिसका असर प्रतिवर्ष सर्दियों में आयोजित होनें वाले कवि सम्मेलनों पर भी पड़ा। इस बार की सर्दियॉ में तो मुझे एक भी कवि सम्मेलन में जानें का मौका ही नही मिला। मैं पुरानें कवि सम्मेलन की सर्द राते और गर्म कुल्लहड़ वाली चाय औऱ समापन समारोह में मिलने वाली गर्म शॉल की यादों में भीग ही रहा था कि अचानक से पीछे से एक आवाज आयी – गुरूदेव चरण स्पर्श.... 


पलट कर देखा तो मेरा पुराना चेला कनचप्पा आ धमका। 

मैनें कहा – कहो कनचप्पा इस सर्दी में कैसे आना हुआ। अरे गुरूवर, कुछ नही बड़ा विकराल संकट आ पड़ा। 

कैसा संकट कनचप्पा मुझे बताओ... 



तो कनचप्पा नें कहा कि गुरूवर मेरी शादी वाले आ रहे है। औऱ आप तो जानते ही है कि मैं जोड़ – तोड़ औऱ ले देकर तो डिग्रीधारक बन पाया हूं, आपके सिखायें शार्टकट से काम निकाल कर वन –टू का फोर कर पा रहा हूं। कहीं लड़की वालों नें मुझसे कुछ पूछ लिया तो भला मैं उनकी परीक्षा में कैसे सफल हो पाऊंगा। 


देख बेटा कनचप्पा – तुम्हे भयभीत होनें की आवश्यकता नही है। तुमे यहॉ पर भी मेरा फारमूला अपनाना होगा। 

बतायें गुरूदेव बतायें जल्द बतायें....................... 


देखो बेटा, तुम्हे लड़की वालों के सामनें कम बोलना है या कहे कि मौन ही रहकर सारे सवालों के जबाब सिर हिलाकर देनें है। और जब तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो जायें और जब लड़की वालें अपनें घर को प्रस्थान करनें वाले हो तो मौके पर चौका लगानें से मत चूकना। 


वो कैसे गुरूवर ..... बताता हूं.....

उस समय तुम्हे अपनें परिवारीजनों से लम्बी- लम्बी बाते इस प्रकार से करनी है कि जिससें उन्हे लगे कि तुम बहुत पढ़े लिखे हो और बहुत अधिक धनवान भी हो। 


इस प्रकार तुम कभी भी नही फसोगे और तुम्हारा विवाह भी हो जायेगा। लेकिन यह प्रयोग अपनें रिस्क पर ही करना क्योकि इसके परिणाम घातक भी हो सकतें है। यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए वैधानिक चेतावनी भी है। 


ठीक है गुरूदेव समझ गया आप चिन्ता मत करियें अब तो मैं दूल्हा बनकर ही रहूंगा। लेकिन गुरूदेव अगले रविवार को आपको मेरे घर पर आना होगा, क्योकि लड़की वाले उसी दिन मेरी परीक्षा लेनें के लिए आ रहे है। आप साथ रहेगे तो यह विवाह मेरे लिए यादगार बन जायेगा। ठीक है मैं अवश्य आऊगा..... 


उधर अगले रविवार को मैं कनचप्पा के घर पहुचा औऱ कुछ ही देर में लड़की वाले आ धमके, मैं एक कोनें मैं बैठकर अपने दियें गुरूज्ञान को सफल होते लाईव देखना चांह रहा था। 


लड़की वालो नें प्रश्न पूछनें प्रारम्भ कर दियें थे और कनचप्पा सिर हिला- हिलाकर जबाब दे रहा था। तभी प्रश्न मंडली में से एक नें कहा कि लड़का बार- बार हर बात का सिर हिला कर जबाब क्यो दे रहा, कुछ बोल क्यो नही रहा है। 


तो सभी चुप हो गयें लेकिन तभी मैनें कहा कि लड़का गम्भीर है और सामान्य जन से कही अधिक बुद्धिमान है जिस कारण से मौन रहकर जबाब दे रहा है क्योकि मौन की अपनी एक अलग महिमा होती है। तो सभी लोगो नें कहा – हॉ भाई हॉ सही बात है.... मैं मन ही मन खुश हो रहा था। 


लड़की वालों के चलनें का समय हुआ तभी कनचप्पा अचानक से उठ खड़ा हुआ औऱ अपनें पिता जी से बोला कि पापा जरा चाबी देना, अपनें एयरोप्लेन को अन्दर खड़ा करना अभी धूप में खड़ा है। 


मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गया कि कनचप्पा यह तूनें क्या किया.... तू तो मेरा भी गुरू निकला इतनी भी लम्बी चौड़ी बाते बोलनें को नही कहा था। 


तो चलते – चलते लड़की वाले भी कह गयें कि हम लोग भी शादी मंगल ग्रह पर ही चलकर करेगे। क्योकि पृथ्वीलोक पर सभी गेस्ट हाउस बुक हो चुके है। 


मैं चुपचाप दबे पांव उधर से खिसक गया और बेचारा कनचप्पा इस बार भी कुआंरा ही रह गया।



लेखक 

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 19 दिसम्बर 2021 के अंक में प्रकाशित किया है। 

व्यंग्य लेख – बड़ी बातों की सजा


मेरे शहर को .................

Gaurav Saxena

 

 मेरे शहर को ..................

 

मेरे शहर को लहराती हवा दे दो।
पंतगों का मौसम है थोड़ी सी ढील दे दो।।
हमें बैमौसम उड़ने का शौक तो है।
लेकिन परिन्दों के साथ रहनें की फितरत दे दो।



मेरे शहर को कोई रोशनी दे दो।
बच्चे काबिल बन जायें, लालटेन में तेल दे दो।।
रोजी रोटी कमाकर खाते तो सब हैं।
लेकिन दिलों में प्यार जिन्दा रहे ऐसी फुर्सत दे दो।।



मेरे शहर को कोई दरिया दे दो।
बिगड़ती हवा में थोड़ी सी नरमी दे दो।
सांसे लेनें में कोई मशक्कत न करनी पड़े।
हमें बिना रोकथाम के ही ऑक्सीजन दे दो।


गौरव सक्सेना 

उक्त पंक्तियों को अमर उजाला नें अपनें काव्य स्तम्भ में शामिल किया है। जिसका लिंक निम्न है। 

https://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/pragya-kumbh

तथा दैनिक समाचार पत्र देशधर्म नें दिनांक 19 दिसम्बर 2021 के अंक में प्रकाशित किया है। 


मेरे शहर को .................


मच्छरों की आम सभा – व्यंग लेख

Gaurav Saxena

मच्छरों की आम सभा – व्यंग लेख



 मच्छरों की आम सभा – व्यंग लेख

चारो तरफ हाहाकार मचा है, हर कोई बीमार पड़ा है। अभी कोरोना राक्षस का वध पूरी तरह से हुआ भी नही था और छोटे- छोटे दलों नें मोर्चा सम्हाल लिया। लग रहा है दलो में गठबन्धन हो गया है। तभी तो मच्छरो के नेता छुट्टन ने एक बड़ी आम सभा का आयोजन किया है जिसमें आस-पास के जिलों तक से मच्छरों को आमंत्रित किया गया है। बड़े – बड़े कटखनें और महारथी मच्छर इस सभा में आ रहे है इन्हे महारथी होनें का तमगा पिछली सभा में दिया गया था। इसका कारण यह है कि इन्होनें विषम परिस्थितियों में भी अपनें आप को जीवित रखनें की कला को इजाद किया है इन्होनें अपनी बॉडी को इतना पावरफुल बना लिया है कि इन पर कोई भी कुकरनाईट, टैक्सो आया, कोर्टीन और धुआं छोड अगरबत्ती का कोई असर नही होता है। आज मच्छर समुदाय की समस्याओ पर तो विस्तार से चर्चा होगी ही साथ में ऐसे महारथियों से भी गुप्त ज्ञान लिया जायेगा। गुप्त इसलिए जिससे कुकरनाईट बनानें वाली कम्पनियां इनकी कमजोरी न पकड़ ले और इनके खात्में के लिए कोई नया प्रोडक्ट न लॉच कर दे। 

अब वो समय आ गया जब भारी भरकम मच्छरों की भीड़ एक मैदान में जमा हो गयी। और सभा प्रारम्भ हो गयी नतीजन मैदान में क्रिकेट खेलते बच्चो को घर भागना पड़ा। सभा को सम्बोधित करते हुयें सरदार छुट्टन नें कहा कि मच्छर समुदाय घोर संकट से गुजर रहा है उसे वह सम्मान नही मिल रहा है जो उसे मिलना चाहियें। कल से आयी कोरोना अपना दम खम दिखा रही है और खूब नाम कमा रही है लेकिन मच्छर दिनो-दिन कमजोर होता जा रहा है। यदि हम एक जुट नही हुयें और समय रहते हमारी समस्याओ पर ध्यान नही दिया गया तो वो दिन दूर नही जब हमारा नामोंनिशान तक नही होगा। सभी नें जोर – जोर से छुट्टन के जयकारे लगायें। छुट्टन नें महारथी कल्लन को मंच पर आंमत्रित किया और उनसे अपने विचार प्रस्तुत करनें को कहा। तो कल्लन नें कहा कि हम सभी का अपना एक नियत स्थान होना चाहियें, सभी का अपना – अपना स्थान होता है मसलन साबुन का साबुनदानी, चूहो का चूहेदानी लेकिन हमारे स्थान का नाम मच्छरदानी दिया तो गया है लेकिन उसमें हमारा वास नही होता है उसमें तो इन्सान घर्राटे भरता रहता है। हम सभी को अपनें स्थान की मांग के लिए धरनें पर बैठना होगा। और तब तक डटे रहना होगा जबतक कि हमे सम्मान सहित स्थान न मिल जायें। हॉ हॉ हॉ..... सभी नें एक स्वर में हुक्कार भरी।   

फिर महा कटखनें महारथी गब्बू दादा की बारी आयी। गब्बू दादा नें बताया कि हम सभी को नियमित व्यायाम करना होगा और रोज दण्ड पेलना होगा जिससें हम शक्तिशाली बन सके तभी हमारी नस्ले जीवित रह पायेगी। औऱ हमें यह याद रखना होगा कि हमें बिना मास्क के किसी भी घर में प्रवेश नही करना है क्योकि अब समय बदल गया है हर घर में हमारी मौत के लिए कुछ न कुछ सुलगता अवश्य मिलेगा। ठीक – ठीक है हम समझ गयें, मंच के नीचे से सभी नें दादा की बात पर अपनी स्वीकृति दी। 

मच्छरों की सभा को गति मिल चुकी थी और छुट्टन नें मंच पर आकर सभी से कहा कि हम सभी इसी मंच पर डटे रहे और आगे एक महा धरना पर चलनें की रूपरेखा बनायें। धरनें की रूपरेखा बनानें से पूर्व एक स्वीकृति हस्ताक्षर पत्र भरवाया जा रहा था जिसमें सभी से सपरिवार धरनें पर बैठनें की स्वीकृति मांगी जा रही थी। 

और तभी मच्छरों की लम्बी चलती सभा और भीड़ की खबर नगर पालिका को लग गयी। और देखते ही देखते पूरे मैदान को सरकारी फांगिग मशीन नें धुयें से भर दिया। सभा में अफरा तफरी मच गयी। मच्छर एक दूसरे के ऊपर चढ़ गयें कोई कहीं से भागता तो कोई कहीं से रास्ता ढूढ़ता । छुट्टन भी कल्लन उस्ताद के साथ खांस्ता हुआ मैदान से भांग ही रहा था कि अचानक से उसकी सास फूल गयी। और वह वीर गति को प्राप्त हुआ...  

कुछ शेष रह पायें मच्छर और महारथी अपनें प्राण बचाकर घरो में दुबक गयें और कसम खाकर बोले कि अब कभी भी सभा नही करेगे और न ही कभी धरनें पर बैठगे।


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र देशधर्म नें अपने 28 नवम्बर 2021 के अंक में प्रकाशित किया है। 



लेखक 

गौरव सक्सेना
मच्छरों की आम सभा – व्यंग लेख




लालच और झूठ की सजा.. बाल दिवस पर विशेष कहानी

Gaurav Saxena

लालच और झूठ की सजा.. बाल दिवस पर विशेष कहानी

 

 

 एक राजा अपनी प्रजा का खूब ध्यान रखता है। और अपनी प्रजा का हाल जाननें के लिए भेष बदल कर राज्य में घूमा करता था। एक दिन भ्रमण के दौरान उसनें देखा कि एक छोटा बालक एक बगीचे में अकेला बैठा रो रहा है। राजा नें पास आकर बालक से रोनें का कारण पूछा तो बालक नें कहा कि बाबा मैं बहुत परेशान हूं। मेरी मॉ बीमार रहती है। बीमारी के इलाज में अब तो मेरी जमा पूंजी तक खत्म होने लगी है। लेकिन मॉ की बीमारी है कि ठीक होनें का नाम ही नही ले रही। तो भेष बदले बाबा के रूप में राजा नें बालक से कहा कि तुम अपनें राजा के पास मदद के लिए क्यो नही जाते, वह बहुत अच्छा राजा है। वह अपनी प्रजा की हर तरह से मदद करते है तो वह तुम्हारी भी मदद अवश्य करेगे। तो उस बालक नें अपनी नजरे झुका ली और बोला कि मेरी मॉ बहुत स्वाभिमानी है वह मुफ्त में किसी से कुछ भी नही लेती है। तो राजा नें कहा कि मैं तुम्हारी कुछ मदद करूं.... तो बालक तैयार हो गया। राजा के मन में एक युक्ति सूझी और उसनें एक बालक से कहा कि तुम एक काम करों तो तुम्हारी मॉ जल्द बिल्कुल ठीक हो जायेगी। 

बालक तुरन्त तैयार हो गया और बोला बताओ बाबा मुझे क्या करना होगा। तो राजा नें कहा कि तुम्हे कभी भी लालच नही करना होगा और मेरी एक तरकीब है उसके बारे में किसी को भी नही बताना है, यहॉ तक कि अपनी मॉ को भी नही। लड़का तैयार हो गया । तब राजा बोला कि तुम्हे कल से रोज इस बगीचे में आना है और केवल एक घंटे के लिए काम करना होगा। क्या काम करना होगा बाबा.... लड़के नें पूछा... तो राजा नें कहा कि तुम्हे सिर्फ बगीचे में पौधो को पानी देना होगा। तो इससे मेरी मॉ की बीमारी कैसे ठीक होगी। राजा बोला यह तुम ईश्वर पर छोड़ दो। लेकिन हॉ जब तुम्हारी मॉ की तबियत ठीक हो जायें तो मुझे अवश्य बताना। जी अवश्य... बालक नें कहा। और अगले दिन से वह बालक बगीचे में ठीक एक घंटे कि लिए जाता और बगीचे में पानी देकर वापस घर चला आता।

 कुछ दिन बाद घर लौटनें पर वह देखता कि उसके दरवाजे पर एक सोनें की मोहर पड़ी है। बालक उसे पाकर खुश हो गया और अपनी मॉ से सोने की मोहर के बारे में पूछनें ही वाला था कि उसे बाबा की बात याद आ गयी कि किसी को कुछ भी नही बताना है औऱ लालच नही करना है। बालक को दो- तीन दिनों के बाद फिर से एक नयी मोहर मिल गयी और मोहक मिलनें का यह सिलसिला चल पड़ा। धीरे- धीरे मॉ को अच्छा इलाज होनें लगा और मॉ बिल्कुल ठीक हो गयी। और फिर एक दिन उस बालक को फिर से वही बाबा मिले और बाबा नें बालक से मॉ की बीमारी के बारे में पूछा तो बालक झूठ बोल गया और कहनें लगा कि अरे बाबा आपकी तरकीब से तो मेरी मॉ की तबियत और खराब हो गयी। तो राजा बोला क्या तुम्हारी मॉ की तबियत में बिल्कुल भी सुधार नही हुआ तो बालक के मन में मोहरो को पानें के प्रति लालच पनप आया उसनें सोचा कि कहीं राजा को कुछ बतानें से कहीं मोहर मिलनें का सिलसिला बन्द न हो जायें। लेकिन अब उसे कुछ दिनों से मोहरे मिलना बन्द हो गया क्योकि राजा को बालक के बारे में सब पता था और राजा ही चुपके से उसके दरबाजे पर वह मोहरे रखता था। 

कुछ दिन बाद बालक औऱ उसकी मॉ पास के ही एक रिश्तेदार के घर गये और राज रोज की तरह उसके घर गया और घर के पीछे की दीवार से उसके बन्द अकेले घर में घुस गया और बालक के सन्दूक में छिपी रखी मोहरे से भरी थैली को वापस उठा लाया। अगले दिन फिर से उसे वहीं बाबा मिल गये तो लड़का फिर रोता दिखायी दिया। तो बाबा नें रोनें का कारण पूछा- तो लड़के नें अपने घर पर चोरी की बात बतायी तो राजा बोला मैनें पहले ही कहा था कि तुम्हे लालच नही करना है। तुम्हारे यहॉ चोरी का कारण केवल लालच और तुम्हारा झूठ बोलना ही है। इन्सान को कभी भी लालच नही करना चाहियें और न ही झूठ बोलना चाहियें। बालक को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। बालक बिना कुछ बोले चुपचाप अपनें घर को चल दिया।

 लेखक

 गौरव सक्सेना

 उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देश धर्म" नें अपनें 14 नवम्बर 2021 के अंक में प्रकाशित किया है। 

लालच और झूठ की सजा.. बाल दिवस पर विशेष कहानी

 

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