मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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शब्दों की बाजीगरी

Gaurav Saxena

 



शब्दों की बाजीगरी


अपनापन, भाईचारा तो कोई मेरे साहब से सीखे। साहब जिन शहरों में नौकरी कर चुके है वहॉ आज भी भाईचारे की अलख जल रही है। या यह कहे कि वहॉ के सभी भाई मिलजुल कर साहब के जानें के बाद भी आराम से चारा खा रहे है। आखिर कुछ बात तो है मेरे साहब में जिससें कुछ ही दिनों में लोग इनके मुरीद हो जाते है और मेरे साहब को अपना बना लेते है। यहीं कारण है कि साहब अपनें कार्यक्षेत्र को कुछ ही समय में अपनें लिए उपजाऊ बना लेते है। यह शहर तो साहब के लिए इतना उपजाऊ हो गया है कि जब- जब साहब के तबालते की बात चलती है तो साहब अपनें भाईचारे के बल पर उसे टलवा देते है। साहब का भाईचारा है ही कुछ ऐसा जो कि मुख्यालय से लेकर हर एक शहर में फैला है।


वहीं साहब के अपनेंपन की भी एक अनूठी दास्तां है, जिस शहर से साहब नौकरी करके यहॉ आये है, वहॉ की एक कहानी बहुचर्चित है। वहॉ का एक सरकारी तख्त साहब को पसन्द आ गया। पसन्द आनें का मतलब है कि वह सामान अब साहब के कार्यालय से उठकर उनके घर जाकर उनके घर को सुशोभित करेंगा। लेकिन सरकारी सामान है अत: कुछ तो शब्दों से खेलना पड़ेगा। बताते चले कि साहब शब्दों के भी पुरानें खिलाड़ी रहे है। इसबार भी उन्होनें शब्दों से खेला और तख्त शब्द में बड़े आ की मात्रा लगाकर अपनें अधीनस्थ कार्यालय को सामान की फाईल भेज दी और तख्त अपनें घर पर ऱख लिया और बदले में अपनें घर से एक बड़ा तख्ता लाकर उसें सरकारी जामा पहना दिया। अधीनस्थ कार्यालय के बड़े बाबू के पास वो तख्ता और फाईल लायी गयी तो बड़े बाबू का भी मन मचल गया अर्थात बड़ा लकड़ी का तख्ता अब बड़े बाबू के घर की बालकनी में सेट कर दिया गया जिसके ऊपर उनके पालतू पक्षियों के पिजड़े शुशोभित हो गये। इस बार बड़े बाबू नें भी शब्दों की बाजीगरी दिखायी और फाइल में तख्ता शब्द में बड़ी ई की मात्रा लगाकर फाईल आगे बढ़ा दी और बदले में अपनें घर से एक तख्ती लाकर सरकारी जामा पहना दिया।


इतिहास गवाह रहा है कि जो शब्दों से खेल पाये वे ही तख्त को तख्ता और तख्ता को तख्ती में बदल पानें में सफल हुयें है बाकी तो सिर्फ अपनें रिटायरमेन्ट के समय गीता लेकर ही विदा हुयें है।

लेकिन साहब का हाल आजकल बेहाल है, कारण यह है कि शब्दों से खेलनें की उनकी यह कला कहीं विलुप्त न हो जायें इसलिए कोर्ट में साहब की पेशी के लिए सन्देश आया है। दअरसल तख्त के तख्ती बनानें की बात जॉच का विषय बन गयी और फिर साहब के पूरे कार्यकाल का लेखा- जोखा देखा गया जिसमें उनके शब्दों के खेल के कई मामले सामनें आये है, इसलिए उन पर कोर्ट का शिकंजा कस गया है। साहब तरह- तरह के हथकन्डे अपना रहे है कि कैसे भी दिन को रात कहा जायें, कैसे भी फिर शब्दों का खेल खेलकर इस मुसीबत से बचा जायें।

इस समय साहब कोर्ट के दण्ड से बचनें के लिए शब्दों की पूजा- अर्चना में लगे है, उनका विश्वास है कि इसबार भी उन्हे शब्दों से राहत मिल जायेगी।

लेकिन शब्दों नें सदैव अपना परचम लहराया है। शब्द सदैव सत्य के साथ चले है लेकिन मेरे साहब जैसे चन्द लोग सोचते है कि शब्दों की बाजीगरी उन्हे शिखर तक पहुंचायेगी। जबकि ऐसा नही है शब्द तो पापों के घड़ा भरनें का इन्तजार करते है। 

इसबार भी शब्दों नें जीत हासिल की जो कि अखबार की मुख्य खबर बनकर सामनें आयी जिसमें लिखा था, शब्दों के बाजीगर को कोर्ट नें सुनायी सख्त सजा।

आज साहब सरकारी कार्यालय की सम्पत्ति में घोर हेरा-फेरी करनें के आरोप में सजा भुगत रहे है।

 

व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 29 जनवरी 2023 के अंक में प्रकाशित किया है। 

शब्दों की बाजीगरी


जनरल डिब्बे की अदभुत यात्रा

Gaurav Saxena

 

जनरल डिब्बे की अदभुत यात्रा


जनरल डिब्बे की अदभुत यात्रा


पत्नी की जिद्द पूरी करना वैसे ही है जैसे किसी सरकारी नियम को अनिवार्य रूप से पूर्ण करना। जिसका पालन करना नितान्त आवश्यक होता है। अत: मैं भी सरकारी नियम के पालन की तर्ज पर पत्नी को साथ लेकर अपनी ससुराल जानें के लिए ट्रेन के जनरल डिब्बें में सवार हो गया। जनरल डिब्बे की हालत तो जग जाहिर ही है वहीं इसकी सीटों की अपनी अलग ही महिमा है। अनारक्षित डिब्बा होनें के बाबजूद भी कुछ सीटों पर लोग चादर तानकर दिन में ही सो रहे थें, सम्भवत: सोनें का नाटक कर रहे होगे। मैनें उन चद्दर में लिपटी आत्माओं के पैर हिलाकर अपनें और पत्नी के बैठनें की जगह बनानें की कोशिश की, लेकिन आत्माएं टस से मस न हुयीं। कुछ लोगो नें बैठनें की सीटों पर अपनें बैंग को भी साथ में बैठा रक्खा था, कुछ दबंग लोग पन्थी मारकर बैठे थें मानों जैसे कोई सतसंग या कथा कर रहे हो। ट्रेन को स्टेशन छोड़े तकरीबन आधा घन्टा से ऊपर हो चुका था, लेकिन हम दोनो को सीट पानें में अभी तक सफलता नही मिली थी। इन सीटों में कुछ तो बात है तभी तो लोगो की चांह इनके प्रति कम नही होती है। चांहे कोई वृद्ध महिला हो या कोई नवजात को गोद लिए नवयुवती हो, जनरल डिब्बें में तो सीट केवल किस्मत से या फिर दबंगयाई से ही मिलती है। आपकी किस्मत अच्छी है या फिर दबंगयाई शरीर और दबंगयाई भाषा के आप धनी है तो फिर आपका स्वागत है श्रीमान इस सीट पर,  नही तो फिर आप टोयलेट के आसपास ही कहीं जगह बनाकर अपनी यात्रा मंगलमय बनाईयें।


सीट न मिलनें की निराशा और थकन साथ लेकर मैं भी अपनी तरह के कुछ अन्य यात्रियों के साथ डिब्बे के गेट के पास जगह बनाकर खड़ा होकर यात्रा करनें लगा। समय बीतता जा रहा था, ट्रेन के अन्दर और बाहर का नजारा लोगो की भीड़ में से कम ही दिखायी पड़ रहा था। तभी मैनें देखा कि चद्दर में लिपटी कुछ आत्माएं उठ खड़ी हुयी तो मैनें सोचा शायद यह आत्माएं सोते–सोते थक गयी होगी इसलिए उठ बैठी है अब शायद हम जैसे लोगो को सीट पर बैठनें की अनुमति मिल सकती है लेकिन मेरी यह सोच गलतफहमी में तब बदलती दिखी जब इन्ही आत्माओं में से एक मेरे पास आकर बोली – बाबू जी खड़े–खड़े थक जाओगे, लम्बा सफर है सीट खरीद लो। इससे पहले मैनें सीट का रिजर्वेशन अर्थात रेलवे द्वारा आरक्षण तो सुना था लेकिन जनरल डिब्बे में सीट का इस तरह से खरीदना अर्थात आरक्षण वो भी इन आत्माओं द्वारा पहली बार ही सुना था। पूंछताछ पर पता चला कि जिसकी लाठी उसकी भैस की तर्ज पर यह दबंग आत्माएं ट्रेन की सीटों पर कब्जा कर लेती है और इनकी नींद तब जागती है जब मेरे जैसे लोगो के पैर खड़े–खड़े जबाब देनें लगते है तब मजबूरन लोग इनकी कब्जे वाली सीट इनसे खरीदते है। खैर मैं इनकी मंहगी सीट नही खरीद सका नतीजन खड़े होकर ही यात्रा मंगलमय बना रहा था।


ट्रेन स्टेशनों को तेज गति से पार करती जा रही थी, तभी एक स्टेशन पर ट्रेन ने अपनें पहियों को थाम लिया, इस स्टेशन पर ट्रेन का ठहराव न होनें के बाबजूद इसका इस प्रकार से रूकना सभी के लिए चौकानें वाला था। तभी आनन फानन में पूरी ट्रेन को रेलवे पुलिस बल नें घेर लिया और देखते ही देखते सभी डिब्बों में अफरा- तफरी मच गयी। पता चला कि रेलवे की मजिस्ट्रेट चेकिंग है और बिना टिकट यात्रियों को पकड़ा जा रहा है। कोई टायलेट में छिपनें की कोशिश करता तो कोई सीट के नीचे, लेकिन सभी की कोशिश विफल होती जा रही थी, पुलिस बल बिना टिकट यात्रियों को पकड़ कर स्टेशन पर उतार रही थी। जो बेटिकट यात्री जुर्माना भरनें में समर्थ थें वे सख्त हिदायत के साथ बरी कियें जा रहे थें और जो जुर्माना अदा नही कर पा रहे थें वे सभी स्टेशन के बाहर खड़ी पुलिस की बसों में आगे की दण्ड प्रक्रिया के लिए बैठायें जा रहे थे। खैर इस अफरा- तफरी का मुझे लाभ मिला और मैं अपनी पत्नी सहित आराम से सीट पर विराजमान हो सका, दबंगो की दबंगयाई पुलिस के सामनें घुटनें टेक चुकी थी। पूरे डिब्बें में केवल टिकटधारी ही रह गये थें बाकि सभी पुलिस की गिरफ्त में थे। सीट और दबंगो का तो चोली दामन का साथ रहा है वह कहॉ छूटनें वाला था, उन्हे इस बार सीट तो मिली लेकिन जनरल डिब्बे में नही बल्कि रेलवे पुलिस बल की बस में। ट्रेन अपनें गन्तव्य के लिए फिर से रवाना हो चली थी, लेकिन अब दूर – दूर तक कोई दबंगयाई दिखायी नही दे रही थी। मैनें भी मौके का फायदा उठाया और चद्दर तानकर गहरी नींद में समा गया। मेरा स्टेशन आनें ही वाला था तो श्रीमती जी नें मेरी चद्दर खींचकर जगाया और बोली कि टिकट का पैसा पूरा बसूल कर लिया हो तो सामान उतारों अपना स्टेशन आनें वाला है। मैं चादर समेट कर सामान उतारनें लगा और फिर चल दिया अपने ससुराल के लिए स्टेशन के बाहर खड़ी बस में फिर से एक नयी सीट खोजने के लिए, तब से लेकर आज तक मैं अपनें और अपनी पत्नी के लिए सीट ही खोजता चला आ रहा हूं......

 

व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना

जनरल डिब्बे की अदभुत यात्रा

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र देशधर्म नें अपनें 22 जनवरी 2023 के अंक में  प्रकाशित किया है। 

इन्सानों की दिल्ली अभी भी दूर है

Gaurav Saxena

 

इन्सानों की दिल्ली अभी भी दूर है



इन्सानों की दिल्ली अभी भी दूर है


इस बार का साहित्य अकादमी पुरूस्कार फिर से कोई इन्सान ले गया। आखिर यह कब तक चलता रहेगा। हम जानवरों के नामों का प्रयोग साहित्यिक लेखनी में एक लम्बे अरसे से होता चला आ रहा है। कभी मुहावरो के रूप में तो कभी लोकोक्ति के रूप में और तो और अब तो हमारे नामों का प्रयोग राजनीति में भी खूब हो रहा है। और बदलें में हम जानवरों को क्या मिलता है सिर्फ इन्सान की लाते, उनकी डांट, फटकार और मार..


लेकिन अब हम ऐसा नही चलनें देगे यदि हमारे नामों का प्रयोग कहीं भी होता है तो इन्सान को उसके लाभ का अंश हम जानवरों को भी देना होगा। आखिर हमारे भी तो बाल बच्चे है। इस महंगाई में हम कब तक दुकानों के नीचें दौनें चाटे। तलबे चाट-चाटकर लोग न जानें कहॉ से कहॉ पहुंच गये और हम वहीं के वहीं पत्तल दौनों में पड़े हुये है। हमें भी पुरूस्कार चाहियें, हमें भी राजनीति से लाभ चाहियें।


सभी जानवरों नें एक सुर में आवाज उठाई तो सभापति शेर नें सभी को शांत रहकर एक–एक कर अपनी समस्या रखनें की अपील की। अपनी बारी में एक वृद्ध कुत्ते नें अपनी जीभ लपलपाकर कहा कि राजनीति और साहित्य में उसकी जाति का नाम खूब धड़ल्ले से लिया जा रहा है। तोड़ मरोड़ कर नयी–नयी उपमायें दी जा रही है। हमारी कुकुरमुत्ता कोम को नित्य बदनाम किया जा रहा है। लेकिन हमनें कभी कुछ नही कहा, हद तो तब हो गयी जब नेता जी की गाड़ियों के पीछे दौड़ते–दौड़ते हमारे एक जवान कुत्ते को उनके काफिले की कार नें रौद दिया। आखिर आप लोग ही बताईयें कि उस जवान कुत्ते का क्या दोष था। क्या समाज में पहरेदारी करना भी अपराध हो गया है। बिल्ली मौसी नें घूघट को मुंह में दबाते हुये कहा कि राजनीति में विरोधियों के लियें कहा जाता है कि खिसियानी बिल्ली खम्बा नौचें। अरे जब इन्सान-इन्सान को नौच रहा है तो हमारे खम्बे नौचनें में क्या बुराई है।


रेगिस्तान से सभा में पधारे लम्बू ऊंट नें कहा कि हर चीज पर क्या इन्सान का ही हक हो गया है जो हमेशा उसे बदनाम किया जाता है। रेगिस्तान में पेट भर पानी नही मिलता है इसलिए जब कभी हम जीरा चबा लेते है तो इन्सान को उसमें भी एतराज है और साहित्य में वह लिखता है कि ऊंट के मुंह में जीरा, अब आप ही बतायें इस महंगाई में जीरा कौन सा कौड़ियों के भाव में बिकता है।


कुछ इसी तरह की मिली जुली प्रतिक्रिया मिंकू बन्दर ने भी दी, उसनें कहा कि इन्सान कहता है कि बन्दर क्या जानें अदरक का स्वाद। अरे तुमनें कब हमें कुछ खानें को दिया है, हमारे बाग-बगीचे तक को उजाड़ कर अपनी बिल्डिगें खड़ी कर ली है। हमारे पेट पालनें तक के तो लाले पड़े है हम भला अदरक का स्वाद क्या किसी को बता पायेगे।


तभी हांफता हुआ गधा रेककर बोला कि उसकी यह हालत इन्सान नें कर दी है, उसका तो कोई वजूद ही नही रहा उसके नाम के प्रयोग से तो कोई भी जगह नही बची है। काम कोई बिगाड़ता है और नाम उसका प्रयोग किया जाता है। बेचारा गधा इन्सानों की हरकतों से परेशान होकर रोनें लगा।


समापन समारोह में सभा में यही निर्णय लिया गया कि अब सभी जानवर सरकार को ज्ञापन देनें दिल्ली कूंच करेगे, जहॉ वे सरकार से मांग करेगे कि यदि उनके नामों का उल्लेख कही भी कोई भी इन्सान करता है तो इन्सान को उसके लाभ का 30 प्रतिशत जानवरों को देना होगा। 30 प्रतिशत इसलिए कि इन्सान उनके नामों का जिक्र महीनें के तीसो दिन जो करता है।

सभी नें हां में हां भरी और एक सुर में निकल पड़े दिल्ली की ओर, लेकिन इन्सानों की भीड़ में जानवरों के लिए दिल्ली अभी भी बहुत दूर है।

 

युवा व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें दिनांक 08 जनवरी 2023 के अंक में प्रकाशित किया है। 

इन्सानों की दिल्ली अभी भी दूर है


जनता के कोरे- कोरे सपनें...............

Gaurav Saxena


जनता के कोरे- कोरे सपनें...............

 

जनता के कोरे- कोरे सपनें...............

मैं आज आश्चर्यचकित और अत्यन्त प्रसन्न हूं। मेरा रोम- रोम पुलकित हो रहा है, मेरा मन कर रहा है कि मैं नागिन डांस करूं, फिर सोचता हूं कि मेरे जैसे लेखक को इस तरह का डांस करते देखकर लोग क्या कहेगे। फिर सोचा चलो बिना नृत्य के ही सभी से अपनी खुशी का इजहार कर दूं। मेरे लिए आज खुशी डबल डोज बूस्टर के रूप में आयी है, कारण यह है कि एक तो नव वर्ष का आगमन और दूसरा यह कि चुनाव जीतनें के बाद नव वर्ष के प्रथम दिन ही नेता जी का मेरे गरीबखानें में आगमन। यह कोई चमत्कार से कम नही है और शायद इतिहास में पहली बार ही ऐसा होगा जब कोई नेता चुनाव जीतनें के बाद जनता का दुख- दर्द जाननें के लिए उसकी झोपड़ी में आयें। फिर सोचा कि शायद मेरे जैसे लेखक के लिए कोई पद खाली रह गया होगा सो उसके लिए मुझे निमंत्रण देनें आ रहे होगे। खैर, मैं श्रीमती जी के साथ नेता जी के स्वागत के लिए जोर – शोर से तैयारी मैं जुट गया। बैठक में से अन्य लेखकों की पुस्तकों को हटाकर केवल अपनी ही लिखी पुस्तके अलमारी में सजाकर रक्खी है, खानें पीनें के लिए कल्लू हलवाई से मिष्ठान उधारी पर इस शर्त के साथ खरीदा है कि यदि कोई पद या बड़ा लाभ हुआ तो ही उसकी उधारी चुकता होगी अन्यथा पूर्व की भांति कोरोना का कहर समझकर उधारी भूल जाना।


आखिरकार नेता जी का का आगमन मेरे गरीबखानें में हो ही गया। मैं नेता जी के साथ आराम से बैठकर चाय नाश्ता कर रहा था और नेता जी के चेले भी सपासट प्लेटे साफ करनें में लगे थें। मैनें सोचा कि कोई बात नही आजकल लक्ष्मी को बुलानें के लिए भी लक्ष्मी खर्च करनी पड़ती है। लेकिन नेता जी नें अपनें पिटारे में से मेरे लिए न कोई उपहार और न ही कोई पद का सिंहासन निकाला। वह कह रहे थे कि अब सब तरफ विकास की ही गंगा बहेगी, लोगो को काम धन्धा मिलेगा, स्वास्थ्य सेवायें चुस्त दुरूस्त होगी। सभी को हर माह मुफ्त अनाज के साथ- साथ एक – एक सिलेण्डर भी मुफ्त दिया जायेगा। आवागमन के लिए सभी को प्रतिमाह 05 ली0 पेट्रोल मुफ्त दिया जायेगा। लोगो को सड़के, बच्चों को कपड़े, रोगी को फल, घरों को नल, किसानों को हल सब कुछ मुफ्त दिया जायेगा।


नेता जी के इस प्रकार के वचनों से मैं भींगता ही जा रहा था और अपना पद और लाभ सब कुछ भुलाकर बस विकास की गंगा में नहाता जा रहा था। गंगाजल निरन्तर मेरे तन को भिगो रहा था कि अचानक ऑख खुल गयी तो देखा कि श्रीमती जी मेरे ऊपर पानी डालकर मुझे जगा रही थी, कह रही थी कि लेखक महोदय उठते हो कि पूरे ड्रम का पानी ही उड़ेल दूं।

मैं इस भयंकर सर्दी में नववर्ष की सुबह ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त कर चुका था और सोच रहा था कि काश सपने का कुछ अंश ही सत्य हो जाता लेकिन सपनें कहॉ सत्य होते है। नेता जी को हम गरीबों की याद तो चुनाव के पूर्व ही आती है. चुनाव के बाद तो सिर्फ कोरे- कोरे सपनें ही रह जाते है।

 

युवा व्यंगकार

गौरव सक्सेना


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 01 जनवरी 2023 के अंक में प्रकाशित किया है। 

जनता के कोरे- कोरे सपनें...............



रिटायरमेन्ट की गीता.. व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 

रिटायरमेन्ट की गीता.. व्यंग्य लेख



रिटायरमेन्ट की गीता


तुम क्यो व्यर्थ चिन्ता कर रहे हो, रिटायरमेन्ट तो अटल सत्य है इसका सुख तो भोगना ही पड़ेगा। तुमसे पहले भी लोग इसका सुख भोग चुके है और आगे भी भोगते रहेगे। लेकिन तुम इसको लेकर इतना अधिक चिन्ताग्रस्त और भयभीत क्यों हो रहे हो। ऐसा क्या रक्खा है इस नौकरी में जो तुम पर छोड़ते नही बन रहा है। चन्द कागज लेकर ही तो तुमनें ज्वाइन किया था और आज मालामाल होकर सेवानिवृत्त हो रहे हो। इतना कुछ पा जानें के बाद भी कमाई से मन नही भर रहा है जो रो रहे हो। कमाई की यह गुप्त तरकीबे ही तो है जिनका रिटायरमेन्ट के बाद उद्घाटन से तुम्हे भय लग रहा है।


इतना प्रेम तो तुमनें आज तक ऑफिस से कभी नही किया फिर अचानक से क्या हो चला है। यह ऑफिस किसी का नही हुआ न कभी किसी का होगा, जिसके लिए तुम इतना दुख द्रवित हो रहे हो। सिर्फ आपका काम ही है जो आपके जानें के बाद यदा-कदा आपके सहकर्मियों के द्वारा याद किया जायेगा। ऑफिस तो समय चक्र का एक हिस्सा है जो घूमता रहता है, और घूम-घूमकर सभी को कमाई का मौका देता है। अब तुम्हारे बाद यहीं मौका तुम्हारे जूनियर को मिलेगा और फिर वह किसी और को देगा।  

यह ऑफिस, डेस्क, सरकारी दूरभाष और फाईले सभी जड़मात्र है चेतन तो सिर्फ वेतन ही है, जो तुमनें भरपूर प्राप्त किया है। 

अब तक ऑफिस में गीताज्ञान प्रवाहित कर रहे थें, अब घर पर रह कर गीता पाठ करना जो कि तुम्हे विदाई समारोह में फ्री उपहार में दी जायेगी। वास्तव में यही गीता ज्ञान तो तुम्हे भवसागर से पार करेगा। जिसको सच्चे मन से शेष बचे जीवन में उतार लेना।


तुम्हारी हेकड़ी, रूतवा, यह नेम प्लेट, सब कुछ तो यहीं छूटनें वाला है साथ तो केवल चन्द मीठे बोल ही जाते है जिनका प्रयोग तो शायद आपनें कभी किया ही नही है।

अब मलाल कैसा जो हुआ उसे छोड़ दो, जो हो रहा है उसे भी छोड़ दो और जो होगा उसे भी छोड़ ही दो। समय रहते रिटायरमेन्ट के बाद की जिन्दगी के बारे में कुछ प्लान कर लो, यह सेविंग, फन्ड, बॉन्ड, गाड़ी, बंगला में से कुछ हिस्सा तो धर्म के नाम संरक्षित करो, अपने कुछ पल तो गीता के लिए निकालों। कुछ नही कर सकते हो तो कम से गीता का ज्ञान ही समाज में फैलाओं।

 

युवा व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 25 दिसम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

रिटायरमेन्ट की गीता.. व्यंग्य लेख




विकास की फाईल...व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 

विकास की फाईल...व्यंग्य लेख


विकास की फाईल


साहब का शौक निराला है, शौक है खोजने का। खोजने के मामले में तो साहब का कोई सानी नही रहा है। वो तो युगों का अन्तर है वरना तो हड़प्पा संस्कृति की खोजकर्ता साहब ही होते। आज कल वह विकास के नयें – नयें अवसर खोज रहे है। सीधे तौर पर तो उनसे इस नयी खोज के बारे में पूछनें की किसी की हिम्मत नही है लेकिन घुमा फिराकर पूंछनें पर साहब बताते है कि जनता के विकास के लिए खोज जरूरी है। पता चला है कि इस समय साहब के चेम्बर का भी विकास कार्य जोरो से चल रहा है जिसमें अग्रेजी जमानें के लम्बी टांग वाले पंखे को हटाया जा रहा है  और पूरे चैम्बर को हर मौसम के लिए अनुकूलित बनानें का जिम्मा साहब के प्रिय विकास बाबू को सौपा गया है। लम्बी टांग वाला पंखा जो न जानें अब तक कितनें साहबों को शीतलता दे चुका है, और अब विकास बाबू के घर के गोदाम में फिट होकर उनके व्यापार को शीतलता देगा। इस पंखा की भी अपनी एक विशेषता रही है कि जितनी लम्बी टांग उतनी अधिक शीतलता लेकिन अब समय बदल गया है अब टांग लम्बी करनें की बजाय टांग अड़ानें और हाथ लम्बे करनें से साहब को शीतलता प्राप्त होती है।


विकास बाबू साहब के साथ मिलकर जनता का विकास जोर- शोर से कर रहे है कल ही तो उन्होनें अपनें मौहल्ले के एक छोर पर चेम्बर से निष्काषित पुरानें सामान का अलाव जलवाया है। जिसकी गर्मी से बचारे गरीबों की सर्द रात कुछ गर्म हो सकी। लेकिन विकास बाबू की जेब में भयकर सर्दी छायी है तभी तो आज अलाव के खर्चे का एक लम्बा बिल साहब की टेबल पर उनके हस्ताक्षर के लिए प्रतीक्षारत है। प्रतीक्षारत तो चेम्बर के बाहर खड़ा लकड़ी वाला भी है जिसनें अपना मुद्रित बिल साहब के विभाग के नाम से जो जारी किया है, उम्मीद है कि लकड़ी वाले को भी कुछ गर्माहट दी जायेगी।


वहीं नेत्रहीन स्कूल के विकास का जिम्मा भी साहब के पास है जिसमें स्कूल का जीर्णोद्धार होना है। जिसके लिए विकास बाबू नें फाईल आगे बढ़ा दी है। लेकिन कई माह बीत गये विकास है कि स्कूल तक पहुंच ही नही रहा है।


परेशान होकर एक दिन स्कूल के मास्टर साहब नें जब साहब के चेम्बर में आकर विकास की स्थिति जाननी चाही तो विकास नें अंग्रेजी में लिखी फाईल दिखायी औऱ आश्वासन दिया कि बस 15 दिन में स्कूल की काया पलट करवा दी जायेगी। बेचारे मास्टर साहब स्वंय नेत्रहीन थें जो कमजोर दृष्टि वाले बच्चों के सहारे चेम्बर तक बड़ी मुश्किल से विकास को खोजनें आ पाये थे। फाईल में क्या लिखा था पढ़ न सके और विकास पर विश्वास करके वापस चले गयें। काश विकास की फाईल मास्टर साहब की ब्रेल लिपि में लिखी होती।


फिर एक दिन समाचार पत्र में खबर छपी कि विकास की बाट जोहते- जोहते नैत्रहीन स्कूल की छत भर- भराकर गिर गयी, बच्चें बाल – बाल बच सके क्योकि सभी बगीचे में सर्दी से बचनें के लिए सूर्य देव की शरण में थें।


विकास की आंच अब विकास बाबू और साहब दोनों को लग चुकी थी। अंग्रेजी भाषा में लिखी विकास की फाईल को पढ़नें के लिए अब पूरा शहर खड़ा हो गया था। लेकिन इस बार भी विकास की फाईल को चूहे कुतर चुके थे। 

 

युवा व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपने 18 दिसम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 


विकास की फाईल...व्यंग्य लेख


जिन्दगी का सौन्दर्य है, रूठना

Gaurav Saxena

 

रूठना जरूरी है..................


जिन्दगी का सौन्दर्य है, रूठना


रूठना भी एक कला है, हर कोई रूठा है। देखादेखी अब तो वो भी रूठ गये है, जो जीवन को सांसारिक मोह माया बता रहे थे। उन्हे अब क्या चाहियें जो रूठे बैठे है। कितना रूठा जायें और कब तक रूठा जायें इसके क्या मापदण्ड है इस पर अभी शोधकार्य चल रहा है। आखिर रूठनें का भी तो कोई मापदण्ड होना चाहियें। चपरासी बाबू से, बांट तराजू से, नौकर मालकिन से, सास बहू से, किचिन महंगाई से, बच्चे किताब से, किताब प्रकाशक से रूठी बैठी है। हर कोई किसी न किसी से रूठा बैठा है। रूठना अब फैशन बन चुका है या यूं कहे कि जिन्दगी का सौन्दर्य बन गया है। तभी तो घर की सुन्दरी मुदरी (अंगूठी) के लिए रूठी बैठी है जो आजकल कोपभवन में निवासित है। कोपभवन से याद आया कि रानी कैकई भी तो राजा दशरथ से रूठी थी, लेकिन उनके रूठनें का फल सम्पूर्ण जगत के लिए कल्याणकारी हो गया था। लेकिन सुन्दरी का रूठना कितना कल्याणकारी होगा यह तो समय रहते ही पता चलेगा। किसी के लिए रूठना कल्याणकारी हो रहा है तो किसी के लिए हानिकारक हो रहा है।


इस बार तो शर्मा जी भी अन्य कवियों की बातों में आकर रूठ बैठे और अपना इकलौता अवार्ड सरकार को वापस दे बैठे, बेचारे गहरी मात खा बैठे। सरकार है कि अब वापस ही नही दे रही है। बेचारे शर्मा जी अवार्ड की फोटो भी न खींच पायें जो कम से कम सोशल मीडियां में तो वाह-वाही करा देती। उधर मुंगेरी लाल भी दुखी है वह रूठा तो नही है लेकिन उससे कोई न कोई हर साल रूठ जाता है जिससे बेचारा हर साल कुंवारा ही रह जाता है। कहीं बेचारें के फूफा जी तो कही मौसा जी और रही बची कसर जीजा जी रूठ कर पूरी कर देते है, जिसके फलस्वरूप मुंगेरी लाल को मिलता है तो सिर्फ कुंवारापन और आयु में बढ़ता एक नया वर्ष। लेकिन बेचारा करे भी तो क्या करें फूफा, मौसा और जीजा के बिना तो भुपन (विवाह) की कल्पना भी नही की जा सकती है।   


लेकिन मरता सो क्या न करता, इस बार मुंगेरी नें ठान ही लिया है कि

फूफा रूठे, मौसा रूठे, चांहे रूठे जीजा लाल।

दुल्हनियां संग नचेगा इस बार मुंगेरी लाल।।

सोचा न समझा पहुंच गया शहर में, जहॉ सब कुछ तो किरायें पर मिलता है। खरीददार की जेंब में गर्मी हो साहब, तो क्या कुछ नही मिल सकता है इस शहर में। खरीद लाया किरायें पर मौसा, फूफा और जीजा जी को। किरायें के रिश्ते तो वास्तविक रिश्ते से कहीं ज्यादा शादी में अपनापन बिखेर रहे है शायद इसी बात का रूपया लगा है। मंडप पर शान्ति से मुंगेरी को किरायें के जीजा कपड़ें पहना रहे थें तभी शान्ती नें मुंगेरी के असली जीजा को बुला लिया। शान्ती मुंगेरी की बहिन जो ठहरी। शान्ती कब अशान्ति के साथ हो गयी पता ही नही चला। पता चला तो बस मुंगेरी नें स्वयं को अस्पताल में पाया, पास में किराये पर खरीदें गये मौसा, फूफा और जीजा जी अपनें पेमेंट के लिए खड़े थें। असली जीजा फरार थें..... बेचारा मुंगेरी इस बार भी बिन दुल्हनियां के ही रह गया। 

 

व्यंग्यकार

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 20 नवम्बर 2022 के अंक में तथा अमर उजाला नें 27 नवम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

रूठना जरूरी है..................


 

जिन्दगी का सौन्दर्य है, रूठना

इन्सानों का जहरीला होता खून...

Gaurav Saxena

 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

अस्पताल में आज अफरा-तफरी मची है, डॉक्टर से लेकर नर्स तक सभी परेशान है सभी के ऊपर नेताओं का प्रेशर है। आम आदमी की कोई नही सुन रहा है। सब बीबीआईपी मरीज की सेवा में जुटे है। आखिर यह बीबीआईपी मरीज कौन है और इसे क्या हुआ है।

 

काफी मशक्कत के बाद पता चला है कि मच्छरपुर के युवा नेता कट्टन नें किसी इन्सान को काट लिया है और इन्सान का जहरीला खून कट्टन मच्छर के अन्दर घुस गया है जिससे उसे भयंकर मलेरिया हो गया है। इसी को लेकर कट्टन के समर्थक नाराज हो गये है और अस्पताल में अपनें नेता के इलाज के लिए शोर- शराबा करनें लगें है। कट्टन के मलेरिया की खबर तो मानों जंगल में आग की तरह से फैल गयी है। देश के कोनें- कोनें में फैले मच्छर समुदाय में इन्सानों के प्रति आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। उधर कट्टन की स्थिति में कोई सुधार नही है। प्रेस रिपोर्टर और छुटभईया यूट्यूबर अस्पताल के गेट पर कट्टन के हेल्थ बुलेटन रिलीज होनें का इन्तजार कर रहे है। उन सभी का इन्तजार करना ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से अपनें पसन्दीदा अभिनेंता की नई फिल्म के रिलीज होनें का इन्तजार उनके फैंस को होता है। 

 

कुछ ही देर में वरिष्ठ डॉक्टरों के एक दल नें गेट पर आकर हेल्थ बुलेटिन जारी किया जिसमें बताया गया है कि कट्टन की स्थिति में कोई सुधार नही है उसे खून की सख्त जरुरत है, खून का जल्द इन्तजाम न हुआ तो उसकी जान भी जा सकती है। उसे O positive खून की जरूरत है। लेकिन प्रश्न यह है कि मच्छरों की जाति में तो सभी का खून मिश्रित होता है क्योकि सभी बिना किसी भेंदभाव के हर ब्लडग्रुप के इन्सानों का खून पीते है। तभी तो इनके ब्लड ग्रुप लम्बे – लम्बे होते है जैसे ABCOO+ इत्यादि।

 

O+ ग्रुप का खून तो कोई इन्सान ही दे सकता है लेकिन इस समय तो इन्सान और मच्छरों के बीच तनातनी बनी हुयी है। अब भला इन्सानों से कोई मच्छर कैसे खून मांगे। इन्सानों से बदला लेनें के लिए गॉवों से टैक्टरों में भर- भर के मच्छरों का दल अस्पताल में आ रहा है। सभी मच्छर अपनें नेता के स्वास्थ्य के लिए अस्पताल में दुआयें कर रहे है तथा मौका मिलते ही इन्सानों पर आक्रमण करके अपनी शक्ति का प्रर्दशन भी कर रहे है। यहीं कारण है कि अस्पतालों में आज इन्सानों से ज्यादा मच्छर भनभना रहे है। इन्सान अपना मुंह छिपाकर घूम रहा है।
 

तभी मच्छरों के एक दल नें कोर्ट में दलील दी है कि इन्सानों का खून यदि दिनों-दिन इतना जहरीला होता गया तो आगे क्या होगा। हम मच्छरों का तो अस्तित्व ही मिट जायेगा। यदि समय रहते इस पर ध्यान नही दिया गया तो समाज में चारों तरफ जहर ही जहर फैल जायेगा और हम मच्छरों से कहीं ज्याद खतरा तो स्वयं इन्सान को इन्सान से होगा। मच्छरों की दलील का जबाब खोजा जा रहा है लेकिन कट्टन के लिए O+ ब्लड डोनर का मिलना अब नामुकिन ही लग रहा है। लग रहा है अब दुआ ही दवा का काम करेगी।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र " देशधर्म" नें अपनें दिनांक 13 नवम्बर 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

इन्सानों का जहरीला होता खून...

 

 

 

रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश

Gaurav Saxena

 रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश

वह कहनें को तो मात्र एक धागा है लेकिन वह एक अटूट बन्धन है प्रेम, वात्सल्य और सम्मान का। इसी धागे को हर वर्ष बहिनें अपनें भाई की कलाई पर बांधती है तो भाई अपनी बहिन को उसकी रक्षा हेतु बचन देता है और यह खास दिवस रक्षाबन्धन कहलाता है और कलाई पर धागे के रूप में बंधा प्यार भाई –बहिन के प्रेम को नित्य मधुरम बनाता है। माना कि आधुनिकता नें इस पर्व के भी मायनें बदले है लेकिन इसे ईश्वरी अनुकम्पा और भारतीय संस्कारों की शक्ति ही कहेगे कि इस पर्व का मूल स्वरूप यथावत बना हुआ है।

बहिनों का भाईयों के प्रति प्रेम औऱ विश्वास अति प्राचीनकाल से चला आ रहा है। इसका जिक्र रामायणकाल में भी देखनें को मिलता है। जब लंकापति रावण अशोक वाटिका में माता सीता से बात करनें जाता था तो माता सीता अपनें और रावण के मध्य में तिनके को रख कर रावण से निर्भय होकर वार्तालाप करती थी। और रावण को चेतावनी देकर कहती थी कि हे दुष्ट राक्षस यदि तुझमें इतनी सामर्थ है तो इस तिनके को पार करके दिखा। लेकिन वास्तव में रावण में इतना सामर्थ था ही नही कि वह इस तिनके को पार कर सकें। क्योकि तिनका भूमि से पैदा होता है इसलिए इसे भूमिज कहा जाता है और माता सीता का जन्म भी भूमि से हुआ है जिस कारण से माता सीता का एक नाम भूमिजा भी पड़ा है। इसप्रकार से तिनका माता सीता का रिश्ते में भाई हुआ। और माता सीता को अपनें भाई पर पूर्ण विश्वास था कि उसके भाई के रहते दुनियां का कोई भी रावण सीता का बाल भी बांका नही कर पायेगा। भाई के प्रति माता सीता का विश्वास अटूट था जो कि वन्दनीय एवं अनुकरणीय है।
इस रक्षाबन्धन पर ईश्वर सभी बहिन-भाईयों की रक्षा करें और भाईयों के प्रति बहिनों के विश्वास को निरन्तर बनायें रखे तथा भाईयों को चाहियें कि हर नारी जाति की को वह सम्मान दे और उनकी रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहें। तभी सच्चे अर्थो में यह पर्व अपनें उद्देश्य को पूर्ण कर सकेगा।

 
लेखक
गौरव सक्सेना


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "वेलकम इंडिया" नें अपनें 12 अगस्त 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 
रक्षाबन्धन पर्व पर विशेष जनहितार्थ सन्देश




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