मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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मंहगाई बनी बीमारी – व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

  मंहगाई बनी बीमारी – व्यंग्य लेख

मंहगाई बनी बीमारी – व्यंग्य लेख



वो वरिष्ठ है क्योकि उन्होनें हम सभी लेखको में सबसे पहले लिखना शुरू किया था। हमारी कौम में वरिष्ठ होना भी अपनें आप में एक बड़ी उपलब्धि है। हम लेखन मंडली उनसे नये विषय प्राप्त करनें के लिए निरन्तर वार्तालाप करते रहते है। आज मैं उनके घर पहुंचा तो वह देखते ही बोले... अरे बेटा कैसे हो ... कैसे आना हुआ। तुम तो मंडी के नीबू हो गये। उनके श्रीमुख से कब क्या निकलकर शिलालेख बन जाये या कहे कि वायरल हो जाये कोई नही जानता। मैने इस नये मुहावरे को आज से पूर्व तो कभी सुना नही था सोचा कि कोई लेखन का नया अपग्रेटेड टर्म होगा, बाद में इसका अर्थ स्पष्ट्र होगा।


लेकिन तभी अन्दर से भाभी जी की आवाज आयी की अब कौन सा नया मुहावरा निजाद कर दिया है। बस बैठे – बैठे शब्दों की ही फसल उगाना। भाभी जी का बड़बड़ाना थोड़ा मन्द हुआ तो मैं साष्टांग प्रणाम करके गुरूदेव के चरणों में बैठ गया। उन्होनें मुझे उठाया और अपनें पास सोफे पर बैठाया और मेरे आगमन का कारण पूछा तो मैनें कहा गुरूदेव मैं सभी लेखको की तरफ से आपके पास आया हूं। हम सभी लेखक परेशान है बढ़ती मंहगाई नें तो जीना मुश्किल कर दिया है। अब आप ही कृपा करके कोई उपाय बतायें जिससे कि हमारी रोजी रोटी चल सकें। ना तो कोई आयोजक बुलाता है और न ही कोई अखबार हमें फूटी कोड़ी देता है। चाय पानी तक के लिए लाले पड़े है।

चाय पानी की बात सुनते ही भाभी जी दो गिलास पानी लेकर आयी। भाभी जी की तनी भृकुटी से स्पष्ट्र था कि मुझे इस सादा पानी को ही नीबू पानी मानना होगा। और माननें में तो हम लेखको का कोई सानी थोड़े ही है। न जानें हमनें अपनें आपको को अब तक क्या- क्या मान रक्खा है।


तभी गुरूवर नें कहा कि बेटा हमारी कौम में भी कुछ कमियां है वरना इतना मुश्किल समय नही है कि हम मंड़ी – मंडी भटके। माना कि समय बदला है, नयी चुनौतियां सामनें आयी है लेकिन इन सभी के साथ-साथ हमें नयें विकल्प भी खोजनें होगे। गुरूवर कुछ स्पष्ट्र नही हुआ और आपको क्या हो गया है यह मंडी और नीबू यह नयें- नयें मुहावरे क्या है। गुरूवर ......

देखो बेटा इन मुहावरों से ही तुम सबसे बड़ी सीख ले सकते हो। समय के साथ – साथ जब ईद का चॉद होना मंडी के नीबू हो सकता है। तो तुम इस मंहगाई में नीबू के नीबू बक्कल के दाम क्यो नही हो सकते हो। लेकिन तुम लोगो को तो एक दिन में ही नीबूपती बनना है। तुम सबके सामनें तो बस भैस के आगे नीबू खानें जैसा है।

मैं समझ चुका था कि मंहगाई से बचनें का कोई उपाय गुरूवर के पास नही है। क्योकि मेरे गुरूवर कोई सरकार थोड़े ही है वह भी तो एक नीबू ही है अरे.... एक इन्सान है।

तभी भाभी जी से पता चला कि मंहगाई के चलते मंडी से नीबू गायब हो गया और कई हफ्तों सें गुरूदेव नें नीबू पानी नही पिया है इसलिए दिमाग पर गर्मी का असर है और गुरूवर निबुरिया नामक बीमारी से ग्रस्त है।

मैं कुछ बोल पाता कि भाभी जी बोल पड़ी कि यह एक नयी बीमारी है और बहुत तेजी से फैल रही है और नित्य इसके नयें वैरियन्ट सामनें आ रहे है।

यह बीमारी मुझें कहीं लगती इससे पहले ही मैं उनके घर से नौ दो ग्यारह हो गया कि कहीं इसका मंहगरिया नामक नया वैरियन्ट मुझे न लग जायें।



लेखक

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज, इटावा


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 15 मई 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

मंहगाई बनी बीमारी – व्यंग्य लेख


पश्चाताप के आंसू

Gaurav Saxena

 पश्चाताप के आंसू

पश्चाताप के आंसू


रामगढ़ में एक प्रसिद्ध राजा राज्य करता था वह बहुत ही धर्मात्मा और न्यायप्रिय था। उसके राजदरबार में एक महान प्रकाण्ड ज्योतिषी था। राजा जी प्रत्येक दिन अपनें जीवन की गृहदशा तथा आनें वाले समय के बारे में उससे पूछते रहते थें और ज्योतिषी को काफी इनाम देकर खुश करते थें यह क्रम काफी दिनों से निरन्तर चला आ रहा था फिर एक दिन राजा नें अपनें जीवनकाल के ग्रह दशा के बारे में पूछा तो पंडित जी नें बताया कि अब आपके दिन बहुत ही खराब आनें वाले है और दो दिन के अन्दर आपकी सर्पदंश से मृत्यु हो जायेगी, यह एक अटल सत्य है क्योकि पूर्व जन्म में आपनें एक नागिन का वध कर दिया था, उसी का नाग आपसे बदला लेना चांह रहा है लेकिन आपकी विशेष सुरक्षा के कारण वह बदला नही ले पा रहा है तथा वह सर्प आपके बाग की एक बामी में निवास करता है। जो कि उपयुक्त अवसर की तलाश में निरन्तर प्रयासशील है। लेकिन अब वह अवश्य ही बदला लेकर रहेगा। 


राजा जी कुछ चिन्तित तो हुये परन्तु उन्होनें धैर्य नही खोया। राजा जी नें अपनें दरबार में आकर सभी सैनिको को सचेत कर दिया और अपनें सैनिको के साथ बाग में सर्प की बामी को देखने गये जिसमें सर्प सो रहा था। राजा नें अपनें सैनिको को तुरन्त आदेश दिया कि सर्प के बामी से लेकर राज सिंहासन तक गुलाब के फूलों को बिछा दिया जाये तथा प्रत्येक 4 फुट पर एक सोनें के कटोरो में दूध रखा जाये। राजा की आज्ञा का पालन किया गया। नियत समय पर सर्प राजा को डसनें के लिए फूलों के बीच से होता हुआ तथा रास्ते में पड़नें वाले कटोरो का दूध पीता हुआ राजा के पास तक पहुंचा। तो राजा नें तुरन्त अपना हाथ सर्प की तरफ बढ़ाकर कहा कि मैं आपका दोषी हूं क्योकि मैनें पूर्व जन्म में आपकी नागिन को मारा था, जो कि किसी भी प्रकार से दोषी नही थी। आप मेरे हाथ को डस ले जिससें मेरी मृत्यु हो जायेगी और इस प्रकार से आपका बदला भी पूरा हो जायेगा।


राजा की बात सुनकर सर्प भावुक हो गया और बोला कि मैं आपके कृत्य से अत्यधिक प्रभावित हुआ हूं। आपनें मेरे सम्मान में जिस प्रकार से पुष्प वर्षा करवायी तथा दूध पिलाया। उससे मैं बहुत खुश हूं और आपको अब मांफ कर रहा हूं। आप दीर्घायु हो।

इतना कहकर सर्प राजा को बिना डसे ही वापस चला गया लेकिन बेचारा राजा पश्चाताप के आसुओं से स्वयं को रोक नही पाया और फूट-फूट कर रोनें लगा। अपनें पूर्व जन्म के अपराध को सोच- सोचकर बहुत दुखी था। लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि सर्प नें उसे माफ कर दिया।


राजा नें सर्प के सम्मान में उस बाग को आम जनता के लिए बन्द करवाकर केवल सर्प के निवास हेतु ही संरक्षित करवा दिया। जिससे कि सर्प बिना किसी व्यवधान के आराम से उस बाग में जीवन यापन कर सकें। हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि राजा के प्रति सर्प एक शत्रु के रूप में था, लेकिन राजा नें उससे घृणा न करके प्रेम किया और प्रेम के कारण ही राजा का जीवन बच सका।  

 

लेखक

जगत बाबू सक्सेना

सह सम्पादक प्रज्ञा कुंभ



उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देश धर्म " नें अपनें 01 मई 2022 के अंक में प्रकाशित भी किया है। 


पश्चाताप के आंसू



बाबू जी का हद्य परिवर्तन - हास्य व्यंग्य

Gaurav Saxena

 बाबू जी का हद्य परिवर्तन

बाबू जी का हद्य परिवर्तन - हास्य व्यंग्य



बड़े बाबू आज कल बहुत दयालु हो चले है और अत्यधिक धर्मात्मा भी। जो कहते थे कि मुझे मरनें तक की फुरसत नही है वह आज समय निकाल कर अन्य महिला कर्मचारियों के साथ काम में हाथ बटा रहे है। औऱ सारे दिन धर्म-कर्म की बाते करनें लगे है। कोई कुछ पूछें तो कहते है सब मोह माया हैसब यहीं का यहीं रह जायेगा। यदि इतना ज्ञान बाबू जी को पहले से था कि सब यहीं का यहीं रह जाना है तो फिर वेतन से गुजारा करनें में क्या हर्ज था। वेतन के अतिरिक्त आय के नित्य नये श्रोतों की खोज करनें का श्रेय हमारे प्रिय बड़े बाबू जी को ही जाता है। मुझे उनके रूखड़ और अभिमानी स्वभाव में अचानक से इस तरह का परिवर्तन देखकर हैरानी होनें लगी है। हर बात- बात पर सभी पर झल्लानें वाले बाबू जीसुविधा शुल्क के बिना काम न करनें वाले बाबू जीसदैव चुगलखोरी और ऑफिस राजनीति में आग का काम करनें वाले बाबू जीपान की पीक से दफ्तर की दीवालों को रंगीन बनानें वाले बाबू जी को आखिर हो क्या गया है। इतना बड़ा बदलाव तो मैनें आज तक कभी नही देखा। आज कल पूरे दफ्तर में सिर्फ बड़े बाबू जी के ही चर्चे है। सभी कर्मचारी आखिर जानना चांह रहे है कि बाबू जी ने कौन सी बूंटी का सेवन कर लिया है जो एकाएक स्वभाव में इतना बड़ा परिवर्तन आ गया है। काश बाबू जी को यह बूंटी पहले मिल गयी होती तो न जानें कितनें कर्मचारियों को मानसिक सुख मिल गया होता।


एक दिन मैनें उनसे पूंछ ही लिया – कि बाबू जी आपके स्वभाव में अचानक से यह परिवर्तन कैसे हुआ। तो बाबू जी बोले कि मैं कुछ ही दिनों में सेवानिवृत्त हो जाऊंगा। तो सोचा कि अन्तिम चन्द दिनों में लोगो का प्यार बटोर लूं ताकि रिटायरमेंन्ट के बाद लोग मुझे याद कर सकें। क्योकि अन्त भला तो सब भला। यदि मैं सभी से प्यार से नही बोलूंगा तो विदाई समारोह में मिलनें वाले सम्मान औऱ पुरूस्कार में कमी आ जायेगी। जो कि मैं किसी भी कीमत पर आनें नही देना चाहंता हूं।

परिवर्तित बाबू जी के स्वभाव में मैं अभी भी उनके पुरानें स्वभाव के प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा था। मैनें कहा - नही बाबू जीआपका विदाई समारोह ऐतिहासिक होगा। आप इस बात की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दे।


देखते ही देखते माह की अन्तिम तिथि अर्थात विदाई समारोह का दिन भी आ गया। पूरे दफ्तर में साफ सफाई का काम चल रहा था। पूरे कार्यकाल में बाबू जी के द्वारा मुख से निकाली गयी रंगीन पिचकारी से दीवालो पर जो चित्रकारी की गयी थीउसको भी ढ़कनें का बन्दोबस्त किया जा रहा था तांकि कैमरे को एक अच्छा बैंकग्राउन्ड मिल सकें। सभी कर्मचारी बाबू जी को भेट करनें के लिए उपहार खरीदकर ला रहे थे। मैं भी बाबू जी के लिए एक कीमती उपहार की खोज में था।


दोपहर का वक्त हो चला विदाई समारोह का प्रारम्भ बस कुछ ही घन्टों में प्रारम्भ होनें वाला था। बाबू जी का अकस्मात ही मन मचल गया। वे चपरासी से बोले कि जाओं ठन्डी शिकंजी बनाकर लाओं। शिकंजी के लिए नीबू की जरूरत औऱ नीबू की बढ़ी हुयी कीमत तथा धूप में बाजार न जानें की चाहत में चपरासी नें भी शार्टकट में छलांग लगायी औऱ नीबू के स्थान पर चीनी घुले पानी में थोड़ी टाटरी मिलाकर बाबू जी को पिला दी। बाबू जी आग बबूला हो गये और जाते – जाते चपरासी को श्राप दे गये कि तेरी कभी भी तरक्की नही हो सकती। मैनें बाबू जी के क्रोध को कोल्डड्रिंक के छीटों से शांत किया और जैसे तैसे कार्यक्रम को प्रारम्भ करवाया। बाबू जी नें दुखी मन से सभी से मिलजुल कर निरन्तर कार्य करते रहनें की सीख दी। सभी कर्मचारियों नें बाबू जी को उपहार देनें प्रारम्भ कर दियें। मेरी बारी आनें पर मैने उन्हे नीबू से भरा एक थैला उपहार दिया जो कि एक आजकल का सबसे महंगा उपहार भी हैऔर मैनें कान में बाबू जी से कहा कि आप नीबू पानी पीकर अपनें मन मस्तिष्क को सदैव शांति प्रदान करते रहना। जिससे कि आपके परिवार में सदैव सुख शांति बनी रहें। बाबू जी धीरे – धीरे कदम बढ़ाकर दफ्तर से विदा ले रहे थें। उनके पीछे चपरासी और उनका लड़का - बहू साथ – साथ चल रहे थें।


दफ्तर के गेट से बाबू जी नें सभी का अभिवादन किया । बाबू जी के चेहरे पर आत्मग्लानि व किसी अपराधबोध की भावना को बखूबी पढ़ा जा सकता था। मैं सोच रहा था कि काश बाबू जी को यह स्वभाव परिवर्तक बूंटी शुरूआती दौर में ही मिल गयी होती जिससें कि दफ्तर के अन्य अधीनस्थ कर्मचारी और जनता का निरन्तर भला होता रहता।  

 

लेखक

गौरव सक्सेना

354 – करमगंजइटावा


उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देश धर्म " नें अपनें 01 मई 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

बाबू जी का हद्य परिवर्तन - हास्य व्यंग्य


स्वाति बूंद कवि सम्मान - व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena


स्वाति बूंद कवि सम्मान - व्यंग्य लेख


 स्वाति बूंद कवि सम्मान

सम्मान एक ऐसा शब्द है जो सभी को सुख देता है और यह शब्द तो हम कवियों के लिए कोई स्वाति बूंद से कम नही होता है। अब आप कहेगे कि कविवर यह स्वाति बूंद क्या है बचपन में इस शब्द से आपका कभी परिचय हुआ होगा लेकिन जिन्दगी की भागदौड़ में तो न जानें क्या – क्या पीछे छूट जाता है फिर तो यह केवल शब्द है। अब सरल भाषा में आपको समझा दे कि चातक नाम का पक्षी होता है जो वर्ष भर प्यासा रहता है वर्षा के रुप में सिर्फ एक स्वाति बूंद पीनें के लिए। इसी स्वाति बूंद के लिए वह पूरे वर्ष भर आकाश को निहारता रहता है। ठीक ऐसी ही कुछ स्थिति मेरी है जो कि साहित्यिक सम्मान रूपी वर्षा के लिए वर्ष भर आयोजकों की ओर निहारता रहता हूं कि कब पुरुस्कार रूपी स्वाति बूंद मेरे कर कमलों को सुशोभित कर कंठ को शीतल करेगी। लेकिन इन्तजार भी समाप्त हो चला है साहित्य सम्मेलन के लिए बुलावा आ गया है आंमत्रण पत्र में लिखा भी है कि कवियों को पुरूस्कृत भी किया जायेगा। तो पुरूस्कार की इस उम्मीद में मैनें अपनी पत्नी को बताया कि कल सुबह ही जयपुर साहित्य सम्मेलन के लिए निकलना है तैयारी करवा देना। श्रीमती जी नें तुरन्त पूछा कुछ मिलेगा भी या फिर वाह वांही में ही अपना फ्री का चन्दन घिसकर चले आयोगे। बात बढ़ती इससे पूर्व ही मैनें यह कह कर बात समाप्त कर दी कि फ्री का चन्दन भला मैं क्यों घिसूंगा। 


सुबह अलार्म घड़ी के जगनें से पूर्व स्वयं ही जाग गया। श्रीमती जी से रास्ते के लिए भोजन बनवाया और एक लम्बे खादी आश्रम के झोलें में अपनी किताबों को समेटकर मैं निकल पड़ा सम्मेलन में भाग लेनें। 

तय समय से पूर्व ही एक बड़े सभागार में प्रथम कुर्सी पर स्वंय को आसीन किया। औपचारिकताओं के साथ पुरूस्कार वितरण प्रारम्भ हुआ तो सोचा कि एक दो कवियों के बाद मेरा नाम आयेगा। अब नाम बोला जायेगा, बस अब तो निश्चित ही बोला जायेगा .....

घन्टेभर के इन्तजार के बाद संचालक नें माईक से घोषणा कि अब अन्तिम पुरुस्कार का वितरण होगा जो कि सबसे बड़ा पुरूस्कार होगा। इसके लिए आप सभी को थोड़ा सा इन्तजार करना होगा। 


मैनें तय किया कि मानों या ना मानों यह पुरुस्कार निश्चित ही मुझे मिलेगा। आखिर समाज को जाग्रत करनें वाली सर्वश्रेष्ठ कवितायें तो मैने ही दी है। लेकिन यह क्या सारा खेल ही पलट गया अन्तिम पुरुस्कार भी कवि चंगू लाल को मिल गया। मैं क्रोध से भरा हुआ चुपचाप से आयोजक के पास पहुंचा तो पूछा कि मुझे पुरूस्कार क्यो नही मिला, क्या मेरा साहित्यिक योगदान कम था। तो वह बोला कि आजकल कविवर साहित्यिक योगदान से कहीं ज्यादा आर्थिक योगदान महत्वपूर्ण होता है जो कि आपनें इस संस्था को कभी नही किया। यदि यही हाल रहा तो हमें अगले वर्षो में आंमत्रण पत्र भी सोच समझकर भेजनें पड़ेगे। मैं आयोजक के शब्दों का अर्थ भली प्रकार से समझ चुका था। अपना झोला उठाया और निकल पड़ा बाजार में, स्वयं ही एक सफेद मखमली शॉल खरीदी और एक स्मृति चिन्ह आखिर श्रीमती जी को तो कुछ दिखाना ही पड़ेगा नही तो ....... तभी दुकनदार बोला कि कविवर स्मृति चिन्ह पर क्या लिख दूं तो मैनें कहा सुनहरे अक्षरों में लिख दो - स्वाति बूंद कवि सम्मान


उक्त व्यंग्य लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 24 अप्रैल 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 



लेखक 

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज, इटावा


कुत्तों की करूण कथा - व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 कुत्तों की करूण कथा -  व्यंग्य लेख


कुत्तापुर के सभी कुत्तें अब आन्दोलन के मूढ़ में है। आखिर बेचारे कब तक घुट- घुट कर घरों की जूठन खाते रहेगे। एक दिन तो घूरे के दिन भी फिर जाते है। उसे भी एक नया स्थान मिल जाता है। तो क्या कुत्तापुर के कुत्ते इतनें बदनसीब हो गये है कि उनके दिन – दिशा नही बदल रहे है। अरे, जब कभी किसी नेता जी की पार्टी के बाद एक दो हड्डी चबाने को मिल भी गयी तो इससे भला क्या होता है। यह कोई दिन फिरनें वाली बात थोड़े हुयी।

बहुत हो गया, अब और सहन नही होता। कुत्तों के सरदार कल्लन नें एक जोर दार आवाज में दहाड़ते शेर की तरह हुंकार भरी। जो कि एक कुत्तों की एक बड़ी सभा को सम्बोधित कर रहा था। सभी कुत्तों नें कल्लन की हां में हां मिलायी। कल्लन बोला कि हम लोगो का समाज में अब कोई वजूद ही नही रह गया है। एक जमाना हुआ करता था जब हमारा सिक्का घूमता था। मौहल्लें के मौहल्लें बटे हुआ करते थें। मजाल है कि कोई तू तड़ाक भी कर दे। लेकिन अब क्या कहे हर कोई लतियाकर चला जाता है। इसका कारण कुछ और नही हमारी कौम में एकता की कमी और हमारा निकम्मापन है जिसकी वजह से ही हम आज दर–दर जूठन के लिए भटक रहे है। विदेशी नस्ले भी हमारी ही कौम से निकली है जिन्होनें केवल अपना हित देखा और हम चुपचाप निठल्लें हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे। जिसका नतीजा यह हुआ कि विदेशी कुत्तें कोठियों की शान होते गयें और हम दिनो-दिन लोगो की अपेक्षा के शिकार होते गये।

आज विदेशी नस्ल के कुत्तें कारो में घूम रहे है, मैम साहब की गोद में खेल रहे है। एयरकन्डीशन कमरों में आराम फरमा रहे है और हम सड़को पर धक्के खा रहे है। लेकिन अब यह सब नही चलेगा। इन्सानों को फिर से हमारी तरफ मुड़ना होगा। क्योकि रखवाली के मामलें में हम अब भी विदेशी कुत्तों से कहीं आगे है। माना कि हम रंग रूप और आकार में उनसे कम है तो क्या हुआ हमारे पास पुराना तजुर्बा है। यही तजुर्बा हमें हमारी खोयी हुयी पुरानी पहचान दिलवायेंगा। सभी कुत्ते ध्यान से कल्लन की बाते सुन रहे थें।

तभी अचानक कुत्तों के युवा कटखनें नेता छुट्टन को उसके चेले लटकाकर सभा के बीच में लायें। उसकी यह हालत देखकर सभा में अफरा तफरी मच गयी। कल्लन नें सभी से शांति व्यवस्था बनायें रखनें की अपील की तथा कल्लन नें उसके चेलों से छुट्टन की इस मरणासन्न स्थिति के बारे में पूछा ? चेले कुछ बोलते उससे पहले ही छुट्टन दबे सुर में बोला–अरे दादा, कुछ न पूछों शार्टकट के चक्कर में मात खा गया। तो कल्लन नें उससे साफ- साफ बात बतानें को कहा। तो छुट्टन बोला कि पिछले हफ्ते विदेशी कुत्तों की प्रदर्शनी लगी थी मैनें सोचा कि कब तक जूठन से गुजारा करेगे, मेहनत भी अब होती नही है तो सोचा कि विदेशी कुत्तों की शक्ल की बिग (बालों का बनावटी आवरण) पूरे शरीर में लगवा ले तो कोई मैमसाहब विदेशी नस्ल का कुत्ता समझकर खरीद लेगी और फिर मौज की जिन्दगी कटेगी।

लेकिन फिर यह हालत कैसे हुयी– बीच में ही कल्लन नें पूछा ?

अरे दादा, एक सुन्दर मैडम को मैं पसन्द आ गया। उनका मैं प्यारा पम्मी बन गया और उनकी गोद में खेलता कूदता घर पहुंचा। तथा शाम को जैसे ही मेरे लिए मसालेदार खाना आया तो मेरी जीभ लपलपा गयी। मुझसे रहा नही गया और मैं मैडम की गोद से उछलकर मसालेदार खानें पर टूट पड़ा। और जल्दबाजी के चक्कर में मेरी बिग(बालों का बनावटी आवरण) मैडम के हाथों में ही रह गयी। और मेरा असली चेहरा मैडम के सामनें आ गया फिर क्या था मैडम नाराज हो गयी और बोली यह तो कोई बाजारी लंफगा कुत्ता है। मारो इसको...... फिर क्या था उनके गार्डो नें मेरी मार- मार कर खाल उधेड़ दी। ऐसी मार से तो अच्छी जूठन ही थी। कम से कम हड्डी पसली तो न टूटती।  

यह सुनकर कल्लन जोर- जोर से ठहाके मारकर हसनें लगा और बोला ठीक रहा। तुम निठल्ले कुत्तो के साथ यही होना चाहियें जो चेहरा बदलकर भेड़ियें के रूप में समाज को नित्य खोखला कर रहे है। यही सब कारणों के कारण आज समाज पिछड़ता जा रहा है।

कल्लन की डांट सुनकर छुट्टन लंगडाते हुयें धीमें से मैदान से बाहर निकलनें लगा औऱ पीछे- पीछे अन्य सभी सभा के सम्मानित सदस्यगण (कुत्ते) भी जानें लगें क्योकि पुलिस को इस आम सभा की भनक लग चुकी थी। और बस कुछ ही देर में पुलिसियां लठ्ठ चलनें ही वाला था।
 
 
उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 17 अप्रैल 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 


 

कुत्तों की करूण कथा


लेखक
गौरव सक्सेना


होली हुयी बदरंग.......

Gaurav Saxena

 होली हुयी बदरंग.......


होली हुयी बदरंग.......


रामलाल का लड़का शहरी बाबू क्या हुआ रामलाल का तो एक जीवन के लिए अपनें गॉव से नाता ही टूट गया। टूटा है एक विश्वास का रिस्ता, टूटा है अपनें हम उम्र दोस्तो के साथ घन्टों किसी नीम के पेड़ के तले सजती महफिलों का सिलसिला। टूटा है किसी बाग की पगडन्डी पर निरन्तर चलनें का सिलसिला। 


बहुत कुछ तो है जो इस शहरी जिन्दगी में रामलाल का खो गया। गॉव का फागुन शायद अब रूठ गया। गीत मल्हारों का दौर अब पीछे छूट गया। त्यौहारो के आनें से पूर्व रामलाल कितना खुश हुआ करता था। होली के लिए तो रामलाल न जानें कितनी बेसब्री से इन्तजार किया करता था। माना कि निर्धनता से नाता तो जन्म से ही था लेकिन त्यौहारों पर परिवार के लिए खुशियां खरीदनें में रामलाल कभी पीछें नही रहा। पकवानों में मिठास तो परिवार और गॉव वालों के साथ ही आती थी जो शायद शहरी आवोहवा में कहीं नदारत हो चली है। गॉवों में संसाधन कम हुआ करते थें लेकिन किसी का कोई काम नही अटकता था। क्या फर्क पड़ता कि किसी वर्ष होली पर किसी के घर पशुधन हानि हो गयी तो कोई रामलाल अपनें घर से उसे खोया दे आता था। आखिर होली पर खोये से बनती गुझियों पर तो सभी का अधिकार है। क्या जमाना होता था कि पूरा गॉव एक बड़े मैदान में होली जलाया करता था। 

उसके बाद मिलनें – जुलने और रंग – अबीर खेलनें का सिलसिला शुरू हुआ करता था। हर एक दिल मिलता था रंगो की इस खुशनुमा बरसात में। लेकिन अब बदलते दौर में रंग – अबीर कमजोर पड़ गये है या कहे कि शहरों की आवो-हवा में बदरंग हो गये है। मिलनें जुलनें की प्रथा लगभग समाप्त हो चली है। यह कहे कि चलो बस हो चुका मिलना, ना तुम खाली ना हम खाली। 


रामलाल आज होली पर यह सब सोच- सोच कर व्याकुल हो उठा, अचानक से उठ खड़ा हुआ खिड़की खोल कर बाहर झांककर देखता है, चश्में में कैद रामलाल की आंखे अपनी पुरानी होली को खोज रही है। जिसमें उत्साह है उमंग है अपनों का प्यार है और प्राचीन विरासत है। 


तभी पीछें से एक तेज आवाज आयी बाबू जी, खिड़की बन्द कर दीजियें धूल मिट्टी कमरे के अन्दर आ जायेगी।

जी बहू करता हूं....... खिड़की बन्द करके रामलाल सोफे पर चुपचाप बैठ गया अपनें गॉव की होली की भीनी – भीनी यादों में................


लेखक 

गौरव सक्सेना

नेता जी की डिग्री - व्यंग्य लेख

Gaurav Saxena

 

 

नेता जी की डिग्री - व्यंग्य लेख

नेता जी की डिग्री

नेता जी आज कल आराम फरमा रहे है क्योकि अभी–अभी चुनाव पूर्ण हुये है और परिणाम अभी नही आयें है। परिणाम के आनें तक अभी तो कोई काम है नही इसलिए घर पर ही आराम कर रहे है। बीच- बीच में रिमोट की बटनों का लगातार प्रयोग उसी तरह से कर रहे है जिस प्रकार से चुनाव से पूर्व अपनी सभाओं को जल्द पूरा करनें में करते थें। तभी उनके चेलो का एक दल आ धमका, औऱ नेता जी नें रिमोट से टी.बी. को स्विच ऑफ किया, लेकिन अचानक से रिमोट की बैटरी खत्म हो गयी, क्योकि इससे पूर्व रिमोट का इतना अधिक प्रयोग उनके घर पर अब तक कभी नही हुआ था। खैर एक चेला उठा और उसनें अपनें लम्बे हाथों का प्रयोग करके मैन स्विच से टी.बी. बन्द कर दी। यह देख कर नेता जी खुश हुयें और कार्यकर्ता के लम्बे हाथों की प्रशंसा करते हुयें बोले कि राजनीति में लम्बे हाथों की अपनी अलग ही महत्ता है, जिसके जितनें लम्बे हाथ उसकी उतनी ही लम्बी तरक्की। अत: हम सभी को अपनें हाथों को लम्बा करनें हेतु नियमित दण्ड बैठक करते रहना चाहियें।

 

सभी चेलो नें एक स्वर में हॉ हजूरी की, तथा वार्ताओं का सिलसिला जारी हो गया। सभी चेले एक–एक कर अपनी रिपोर्टिंग कर रहे थे। वार्ता शिखर वार्ता का रूप लेती उससे पूर्व ही नेता जी नें अपनें हैड चेला कनचप्पा से पूछा कि हमारी जीत को लेकर उसके पास क्या ऑकड़े है। कनचप्पा को वर्षो का अनुभव रहा है। आजीवन राजनीति में ही चमचागीरी करता रहा है। ना जानें कितनें नेताओँ की चमचागीरी करते – करते आज इस मुकाम तक पहुंचा है। चमचागीरी में तो वह सबसे उच्च डिग्री चमच परास्नातक तक प्राप्त कर चुका है। यही कारण है कि हर एक पार्टी उसे अपनी पार्टी में आनें के लिए आंमत्रित कर चुकी है। कनचप्पे नें सिर खुजलाते हुयें कहा कि इस बार आपकी जीत पक्की है क्योकि लहर आपकी ही ओर चल रही है। तो नेता जी खुश हुये और बोले मेरी लहर चल रही है तो फिर टी.बी. वाले विपक्ष के गुणगान क्यो गा रहे है। 

 

कनचप्पा बोला गुरूदेव राजनीति में घिस-घिस कर मैं अब चन्दन बन चुका हूं। आप मेरी बात पर पूर्ण विश्वास करें और अपने विजय उत्सव हेतु हम सभी को दिशा निर्देशित करें।

नेंता जी -बिल्कुल मैं तुम सभी को जल्द ही आगे की रूपरेखा बताता हूं। और वार्ताओँ का समापन नेता जी की पत्नी की तेज आवाज से होता है कि तुम्हारी चुनावी वार्ता समाप्त हो गयी हो तो बिटिया के कॉलेज के लिए पैसा भिजवा दो। एक सप्ताह से कॉलेज वाले फीस भरनें के लिए रोज फोन कर रहे है। अगर फीस नही भरी तो कॉलेज से नाम काट दिया जायेंगा। फिर दोनो बाप-बेटी लड़ते रहना – चुनाव....

 

मैम साहब के क्रोध को सभी चेलो नें समय रहते भांप लिया और धीरे – धीरे करके सब खिसकनें लगें।

चलते- चलते नेता जी कनचप्पा से कान में बोले कि यार किसी तरह से कुछ जुगाड़ करके मुझे भी कोई डिग्री दिलवा दो। आये दिन जनता और पत्रकार पूछते रहते है कि नेता जी आप की क्वालिफिकेशन क्या है। कनचप्पा बोला मैं एक ऐसे विश्वविद्यालय को जानता हूं जहॉ से आप अपनी इच्छानुसार कोई भी डिग्री बिना पढ़े लिखे व बिना कॉलेज का मुंह देखे घर बैठे ही आसानी से प्राप्त कर लोगे। यही एक आसान रास्ता है अपनें आप को पढ़ा लिखा साबित करनें का। 

 

लेकिन कोई गड़बड़ तो नही होगी, नेता जी ने तुरन्त पूछा।

अरे नेता जी आज तक आपके किसी काम में तनिक भी क्या कोई गड़बड़ी हुयी है ?  

नही, लेकिन कोई मुझसे कुछ पूछनें लगा तो मैं क्या जबाब दूंगा। आज तक आपके कामों के बारे तक में तो किसी नें कुछ नही पूछा और पूछा भी है तो उसका जबाब आपके सेवक कनचप्पा नें सदैव दिया है। फिर तो यह सिर्फ एक डिग्री है।

कनचप्पा का अनुभव काम आया और नेता जी विजयी घोषित हुयें। कुछ ही दिनों में नेता जी राजनीतिशास्त्र से परास्नातक भी हो गये। लेकिन बेचारे एक दिन पत्रकारों के सवालों के घेरे में पड़ गये, बात बढ़ गयी और नेता जी की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लग गया। नतीजन डिग्री की सघन चेकिंग हुयी जो कि फर्जी निकली।

नेता जी नें आनन- फानन में कनचप्पा को बुलाया और कहा यार तूनें मरवा दिया। मेरी डिग्री की पोल खुल गयी। तेरी फर्जी डिग्री से तो मैं अनपढ़ ही अच्छा था।

तो कनचप्पा बोला नेता जी डिग्री के पीछे लिखा भी तो था। कि डिग्री का प्रयोग अपनी रिस्क पर करे। पढ़े लिखे लोगो से न उलझे तथा इसका प्रयोग केवल फेसबुक, व्हाट्सअप तथा विश्वविद्यालय तक ही सीमित रखे। लेकिन आपनें इसे वास्तविक जिन्दगी में उतारा है इसीलिए गहरी मात खा गयें। 

 

लेखक

गौरव सक्सेना

 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 06 मार्च 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

नेता जी की डिग्री - व्यंग्य लेख

 

कुत्तों के हिस्से का खाना

Gaurav Saxena

 कुत्तों के हिस्से का खाना

कुत्तों के हिस्से का खाना


रामलाल के भी चौबारे में मंगल घड़ियों के सजनें सवरनें का समय आ गया था। आखिर कब से अपनी बिटिया राधा के लिए कोई अच्छा रिश्ता खोज रहा था। अब तो राधा की सभी सखियों की भी शादी हो चुकी थी। पूरे मौहल्ले में केवल राधा ही तो शेष रह गयी थी जिसका अभी तक विवाह न हो सका था। जिसका कारण था कि लड़के वालो की दहेज की मंहगी मांग, जो शायद रामलाल के लिए पूर्ण कर पाना असम्भव था। लेकिन देर से ही सही लड़का तो अच्छा मिल गया, घर परिवार भी ठीक है। वैसे तो दहेज के बिना अब शादी का होना केवल एक सपना ही रह गया है। आखिर कब तक रामलाल अपनी बेटी का विवाह रोककर रखता। हर कोई तो है जो रोज उसे तानें मारता है कि रामलाल इस साल तो बिटियां के हाथ पीले कर ही दो।    


रामलाल नें भी भली प्रकार से समझ लिया है कि आज के जमानें में दहेज के मायनें बदल गये है जिसें उपहार के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। अब लड़की वालों को मंहगे सामान खरीदकर उपहार स्वरूप लड़के वालों को देनें होते है। रामलाल नें लड़के वालों की मांग पूरी करने और उनके स्वागत सत्कार, खानपान आदि की व्यवस्था पूर्ण करनें के लिए न जाने कितने लोगो से उधार पैसा ले लिया है। अब शादी के कुछ ही दिवस शेष बचे है और रामलाल अपनें परिवार के सभी सदस्यो के साथ मिलकर शादी की तैयारी पूरी करने मे जी जान से जुटा है। बेचारा रामलाल दिनभर की थकान लेकर बिस्तर पर लेटा ही था कि पत्नी शारदा ने आकर बताया कि आज लड़के वालो के यहॉ से सूचना आयी है कि हमें शादी में खानें – पीनें के व्यंजनों की संख्या और अधिक बढ़ानी होगी जिसमें हमें कई तरह के पकवान और बनवानें होगे। तथा कॉफी, गर्म मेवा दूध जैसे काउन्टर और लगवानें होगे।


रामलाल नें नयी फरमाईश सुनकर एक गहरी सांस ली और बोला करेगे पूरी फरमाईश आखिर हम बिटियां वाले जो है। अब नयी फरमाईश कैसे पूरी होगी इसी सोच विचार में रामलाल कब सो गया पता ही नही चला। अगली सुबह उठकर चल दिया कोई नया देनदार खोजने, जो उसे इस नयी फरमाईश को पूर्ण करनें के लिए धन उधार दे सके।


आखिर शादी का दिन भी आ गया। रामलाल बारातियों के स्वागत में कोई भी कसर नही छोड़ना चाहता था। अपनी सामर्थ्य से कई गुना अधिक खर्च करके बेटी की शादी कर रहा था। कि उसे ससुराल में कोई परेशानी न हो। या यूं कहे कि उधार के पैसो से बेटी के लिए खुशियां खरीद रहा था। सब कुछ व्यवस्थित रूप से चल रहा था। बाराती मस्त हाथी की तरह खानें के काउन्टरो पर खाने पीने का लुफ्त उठा रहे थें। थाली में भूख से कहीं ज्यादा व्यंजनों को परोस रहे थें। जितना खा पाते उतना खाते बाकी फेक देते। तभी रामलाल के बड़े बेटे नें बताया कि पापा खाना कम पड़ रहा है। आनन-फानन में रामलाल नें अपनें रिश्तेदारों से पैसा उधार लिया और जल्द बाजार से अतिरिक्त सामान मगांकर दावत को सुचारू रूप से चलाया। किसी भी प्रकार की कोई कमी नही होने दी और न ही किसी प्रकार की कोई व्यवस्था को भंग होने दिया।


सब कुछ अच्छे से निपट गया बेटी को खुशी – खुशी विदा करके बैठा ही था कि मैरिज होम वाले नें आकर कहा कि रामलाल मैरिज होम की सफाई करवानें के लिए तुम्हे अतिरिक्त रूपया हमारे लड़को को देना होगा। चूंकि रामलाल अतिरिक्त खर्चे के नाम से परेशान हो चुका था। वह तुरन्त बोला कि अब तुम्हारे लड़को को अतिरिक्त पैसा क्यो चाहियें। तो वह रामलाल को कूड़े के ढ़ेर के पास ले जाकर बोला - देखो रामलाल कितना खाना बारातियों नें बर्बाद किया है। रामलाल नें देखा कि कैसे बारातियों नें खानें को बर्बाद करके उसका ढ़ेर लगा दिया जिसमें कुत्ते घुस कर अपनी भूख मिटा रहे थें। रामलाल सोच रहा था कि आज के लोग कैसे हो चले है जो खाने को इस कदर बर्बाद करते है। जिसके लिए कोई रामलाल अपनी जिन्दगी भर की दौलत लगा देता है।


रामलाल अपना सिर पकड़ कर बैठ गया तभी हलवाई, टैन्ट, सजावट वाला, फोटोग्राफर औऱ अन्य सभी अपने – अपनें भुगतान के लिए बिल लेकर आ गयें।

बेचारा रामलाल सभी को आश्वासन दे रहा था कि वह सभी का पेमेन्ट जल्द पूरा अदा कर देगा। और कुत्तो की संख्या बढ़ती ही जा रही थी क्योकि इन्सान के द्वारा बर्बाद कियें गये खानें पर उनके अलावा किसी और का हक नही था। और न ही उन्हे कोई रोकनें वाला था।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें दिनांक 27 फरवरी 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 

कुत्तों के हिस्से का खाना



मतदान जरूरी है वोटर जी।

Gaurav Saxena

 


 

चुनावी काव्य



मतदान जरूरी है वोटर जी।

चुनावों की बहार में नेता जी लहराते है।

नित्य नयें वादों में आकर वोटर को रिझाते है।।

जो काम पूर्ण न हो सके उनका भी जिम्मा लेते है।

कुछ भी तो कठिन नही है अब, नेता जी बतलाते है।।

 

मत की ताकत है बड़ी, क्यो भूल रहे हो वोटर जी।

सुनना सबकी करना मनकी, भूल न जाना वोटर जी।।

समझदारी से मत करना वरना पछताओगे वोटर जी।।

लोकतंत्र की रक्षा हित मतदान जरूरी है वोटर जी।

लेखक

गौरव सक्सेना

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