मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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अबकी बरस भेज भईया को बाबुल.......................

Gaurav Saxena

अबकी बरस भेज भईया को बाबुल.......................


अबकी बरस भेंज भईया को बाबुल.......................


वर्ष 1963 में फिल्म बंदिनी के गीत पर यदि हम ध्यान दे तथा उस समय के श्रावण पर्व से आज के पर्व की तुलना करें तो हम पायेगे कि हमनें बहुत कुछ खोया है। किस खूबसूरती के साथ गीत में शब्दों और भाव से विरह वेदना, प्रेम, बाल्यावस्था,युवावस्था, भाई-बहिन के प्रेम, और माता-पिता के प्रेंम को जीवन्त रूप में फिल्माया गया है। अफसोस है कि अब इस तरह की फिल्में नही बनती, और यदि बन भी जायेगी तो शायद दर्शक नही मिलेगे। आज इस नगमें के द्वारा हम भारतीय त्यौहार रक्षाबन्धन और इसकी एक लम्बी विरासत को समाज के सामनें लानें का प्रयास कर रहे है।

देखा जायें तो आज रक्षाबन्धन या फिर कोई अन्य त्यौहार ही क्यो न हो सभी अपनी पुरानी भाईचारे, समन्वय और प्रेंम की विरासत को खोते जा रहे है। आधुनिक भेड़चाल के चलते मानवीय मूल्यों का निरन्तर पतन हो रहा है। भाईचारे की भावना को स्वार्थ रूपी मानसिक संकीर्णता के कीड़ो ने कुतर डाला है, जिसके चलते त्यौहारों के प्रति लोगो में कोई खास उत्साह नही देखा जाता है केवल परम्पराओं के नाम पर लीख पीटी जा रही है।

प्राचीन काल से ही पर्व समाज को एकजुटता और भाईचारे के सूत्र में पिरोनें का काम करते रहे है। तभी पूर्व से ही सावन मास में प्रकृति को संरक्षित और संवर्धन करनें के काम में जनसहभागिता दिखायी पड़ती थी, लोग उत्साह के साथ वर्षा जल सिचिंत करते थें, वृक्षों का रोपण किया जाता था, जलाशयों, नदियों, सरोबर, पोखरों और तालाबों की साफ-सफाई की जाती थी, तथा रक्षाबन्धन पर्व की विशेंष तैयारियां की जाती थी, लोक संस्कृति को बढ़ावा देते लोकगीत कजरी, आल्हा कथा, मल्हारे गाये व सुने जाते थे, पेड़ो पर झूले डाले जाते थे लोग रक्षाबन्धन वाले दिन शाम को भुजरियां तालाबों में प्रवाहित कर एक दूसरे को देर रात तक शुभकामनायें देते थें, गरीब व असहाय लोगो की लोग मदद करतें थें उन्हे पकवान और अनाज देते थें। एक अलग ही उत्साह होता था, यह सब परम्परायें तो अब यदा कदा ही देखनें को मिलती है। इन परम्पराओं का इस तरह से विलुप्त होना नि:सन्देह एक चिन्तनीय विषय है जिसकी पुन: स्थापना हेतु समाज को आगे आना होगा तभी भारतीय संस्कृति समाज में जीवित रह सकेगी।


इस पर्व पर बहिनें अपनें भाईयों की रक्षा के लिए उनकी कलाईयों पर रक्षासूत्र बांधकर उनकी लम्बी उम्र की कामना करती है। भाई भी उनकी रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी का बोध कराते है। अब भाईयों को चाहियें कि बहिनों की रक्षा के साथ- साथ उन्हे शिक्षित करनें को अपनी  प्राथमिकता में शामिल करें, तथा घर परिवार समाज में यह जागृति फैलायें कि हर घर की बेटी शिक्षित हो, क्योकि जब बेटियां पढ़ेगी तभी एक शिक्षित समाज का निर्माण होगा। तथा त्यौहारो को उत्साह और भाईचारे की भावना के साथ मनायें, अपनी प्राचीन लोक संस्कृति को बढ़ावा दे, ध्यान रहे कहीं आधुनिकता की दौड़, हमारी भारतीय संस्कृति की भक्षक न बन जायें। आधुनिक बनियें लेकिन अपनी जड़ो से जुड़े रहियें और संस्कृति के रक्षक बनियें, तभी सच्चे अर्थों में रक्षाबन्धन पर्व अपनी उपयोगिता सिद्ध कर पायेंगा। और यह पर्व अपनी गौरवशाली भारतीय परम्परा के रुप में समाज को एकजुटता के रूप में जोड़ पायेगे।


लेखक
गौरव सक्सेना

चीनी राखी का बहिष्कार, कोरोना सुरक्षा के साथ

Gaurav Saxena

चीनी राखी का बहिष्कार, कोरोना सुरक्षा के साथ

चीनी राखी का बहिष्कार, कोरोना सुरक्षा के साथ





स्वच्छ हवा, कल-कल बहती मेरे गांव की नदी का पानी, चहचाते पशु पक्षियों की कर्णप्रिय आवाज से गुंजयमान होता मेरा आंगन कितना सुखद आन्नद देता है, इसे तो केवल अन्तर्मन से महसूस किया जा सकता है। त्योहारों पर पूरे गांव का मिलजुल कर खुशियॉ बाटंनें का सिलसिला यहॉ बहुत पुराना है, पुश्तैनी रिश्ते परिवारों को जोड़े है, परन्तु फिर भी शहरी आवों हवा तो अपना दम खम्भ दिखा ही देती है, नतीजन अब चार पैसे कमानें की कहकर बच्चों के साथ शहर में बस जाना, और गॉव में अपने पुश्तैनी मकान को बेचनें का कारोबार तो शुरू हो ही गया है। अपनी- अपनी सम्पत्ति है अपना- अपना मत है, किसी को शहर ही भानें लगे तो फिर भलां कोई गांव में कैसे टिकेगा।

अरे, मौसी लोगो की अपनी मर्जी है, हमारा उसमें कोई जोर थोड़े ही है। रघुनाथ नें बीच में ही मौसी की बात को अलग रूप देनें की कोशिश की। दरअरसल मौसी गॉव के ही प्राइमरी स्कूल मे हेड मास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुय़ी थी, और गांव में सबसे ज्यादा उम्र के साथ- साथ पढ़ी लिखी वुजुर्ग महिला है। इसी वजह से गांव वाले उन्हे सम्मान से मौसी कहकर पुकारते है और बहुत आदर भी करतें है। हर तीज त्यौहार पर मौसी कोई न कोई रचनात्मक कार्य गांव की खुशहाली और एकता के लिए करवाती रहती है। तथा हर सुख-दुख में लोगो की यथा सम्भव मदद भी करतीं है।

मौसी, किशन भईया इस रक्षाबन्धन पर गांव तो आ रहे है ना। रघुनाथ नें मौसी के एकलौते लड़के किशन के बारें में पूछा- जो कि शहर में अपना एक बड़ा व्यवसाय करता है। और लगभग त्यौहारों पर ही गांव में आ पाता है।
अरे रघुनाथ, कुछ ना पूछों, इस बार तो कोरोना नाम की बीमारी नें आफत में जान डाल रक्खी है, कल ही किशन से फोन पर बात हुयी थी कह रहा था कि कोरोना के चलते इस बार रक्षाबन्धन पर घर आ पाना मुश्किल लग रहा है। तो मैने भी ज्यादा जोर जबरदस्ती नही की, यहीं कह दिया कि अपनें हिसाब से देख लेना।

मौसी तुमनें बिल्कुल ठीक किया। लेकिन मौसी इस बार रक्षाबन्धन पर कैसे क्या तैयारी करनी है आपनें कुछ बताया भी नही, अरे बेटा रघुनाथ इस बार कोरोना के कारण बहुत सर्तकता बरतनी है, अपना त्यौहार भी खुशी- खुशी निपट जाये और किसी प्रकार का संक्रमण भी न हो, इस बात का विशेष ध्यान रखना है। हॉ मौसी इस बार के लिए अपनी रुपरेखा बतायें तभी मास्क लगायें प्रधान जी भी आ गये, मौसी प्रणाम, जीते रहो बेटा...
अरे रघु तुमनें सावन उत्सव के लिए मौसी से बात नही की, प्रधान नें रघुनाथ से उत्सुकतावश पूछा।
नही नही प्रधान जी, उसी विषय पर चर्चा हो रही थी, आप बिल्कुल सही समय पर आयें है।
ठीक – ठीक मौसी बतायें...

हॉ तो मैं बोल रही थी कि गांव की नदी की साफ- सफाई करनी है और नदी में किसी भी प्रकार के कूड़े करकट को नही डालना है और गांव के प्रत्येक परिवार के लिए रक्षाबन्धन के दिन नदी पर भुजरियॉ सिरानें का समय बांध देना जिससें अनावश्यक भीड़ न जुट पायें और बाद में शाम को भी इस बार मेल मिलाप के लिए एक दूसरे के घर जानें के बजायें आपस में फोन पर ही बात करना है। और हॉ इस बार तो चीन को भी सबक सिखाना है, इसके लिए तो मैनें शुरूआत भी कर ली है।

क्या मौसी जल्द बताऔ, हम लोग भी समय रहते इसकी भी तैयारी कर ले। अरे कुछ नही इस बार हम सबकों अपनें घर पर धागा से ही राखी बनानी है और बाजार में बिकती चाइना राखी को किसी भी कीमत पर नही खरीदना है। इससें घर का पैसा घर पर रहेगा और चीनी सामान का बहिष्कार भी हो सकेगा।

और हॉ इस बार उपहार स्वरूप मैं अभी से ही तुम सबके घरों पर अपनी बनी राखियॉ और मास्क भेजने लगी हूं। इस बार का त्यौहार के साथ-साथ कोरोना और चाइना के साथ अपनी लड़ाई भी है। हम सभी को मिलकर इन दोनों को ही हराना है।

ठीक- ठीक, मौसी बिल्कुल सही विचार है। हम सबकी भी इस बार त्यौहार मनानें के पीछे कुछ ऐसे ही विचार थे, परन्तु सही रूपरेखा नही बन पा रही थी। वो क्या है कि हम लोग थोड़ा कम पढ़े लिखे है ना।
अरे कोई बात नही तुम लोग त्यौहार की तैयारी करों।

और इस प्रकार प्रधान जी औऱ रघुनाथ दोनो मौसी के बताये तरीके से रक्षाबन्धन की तैयारी के लिए निकल पड़े।
और मौसी जी की घर की बनी राखियों औऱ मास्क ने पूरे गॉव में जो सन्देश दिया है वह अपनें आप में अनूठा है, गॉव के सभी परिवार की महिलायें अपनें घर पर ही रक्षाबन्धन पर्व के लिए राखी और मास्क तैयार कर रही है। जो महिलायें कोरोना के कारण अपनें मायके नही जा पा रही है वह डाक द्वारा अपनी घर पर बनी राखियॉ भाइयों को भेंज रही है। जिससें स्वदेशी वस्तुऔं के प्रति लोगो का रूझान बढ़ा है और वहीं दूसरी और चीनी उत्पादों का बहिष्कार भी हो रहा है।

लेखक
गौरव सक्सेना



तुलसी के प्रिय राम

Gaurav Saxena
तुलसी के प्रिय राम

तुलसी के प्रिय राम


मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम चन्द्र जी के जीवन के कोने- कोने में समहित बाबा तुलसीदास जी का  जन्म श्रावणमास की सप्तमी के दिन हुआ था, इस बार यह पुण्य दिवस 27 जुलाई 2020 को है। आज उनकी जयन्ती पर आवश्यकता है उनके सिद्धान्तो और ग्रंथो से शिक्षा लेकर उसे जीवन में आत्मसार करनें की।  


ज्ञान और भक्ति की गंगौत्री के रूप में प्रतिष्ठित तुलसी नें राम को जिस रूप में प्रस्तुत किया है उससे समाज के हर एक जन को जीवन जीनें का आधार मिला है। तुलसी की लेखनी नें उस समय समाज में फैली कुरीतियों, अनर्थक अधर्मी विचारधारा   ओं का पुरजोर खंडन किया। बाल्मीकि जी के बाद आज के समाज में यदि राम को किसी नें घर –घर तक पहुंचाया है तो वह केवल तुलसीदास जी ही है। तुलसीदास जी नें रामचरित्रमानस में प्रभु श्रीराम के चरित्र को समाज से जोड़ा है, श्री राम चन्द्र जी को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करके बाबा तुलसी समाज में मानवीय चरित्र पर बल देते हुये तथा राष्ट्र धर्म की रक्षा करतें हुयें रामराज की स्थापना को चरितार्थ किया है। 


आज हम चाहे किसी भी धर्म में आस्था रखनें वाले हो हमें तुलसी की लेखनी से शिक्षा लेनी चाहियें, जिनकी लेखनी समाज के हर एक वर्ग और व्यवस्था को स्पर्श करती है तथा हर वक्त मनुष्य को दृढ़ता के साथ विपत्तियों का सामना करनें का आत्मबल भी प्रदान करती है। सच में तुलसी किसी व्यक्ति विशेष से ज्यादा एक युग का उच्चारण है। 


आर्दशों के बिना जीवन का कोई मूल्य नही होता है, वहीं बाबा तुलसी नें समाज में आदर्शो के रूप में राम को प्रस्तुत करके लोगो को जीवन जीनें का उद्देश्य दिया है। आज के समय में बाबा तुलसी का ग्रंथ रामचरित्रमानस घोर निराशा में भी आशा की किरण देता है जीवन के हर क्षण को सुखमय बनानें और विषम परिस्थितियों से लड़नें की शिक्षा प्रदान करता है। 


किसी नास्तिक मन को भी भक्ति की संजीवनी देनें में समर्थ बाबा का महाकाव्य अदभुत है जिसकों आज भी बड़ें भाव के साथ कहा और सुना जाता है। हम सभी को चाहियें कि अपनें जीवन में किसी न किसी आदर्श की स्थापना अवश्य करें तथा प्रत्येक क्षण उसके जैसा बननें के लिए चेष्टारत भी रहें। ईश्वरी शक्ति हमारे मन, वचन और कर्म को सरल बना देती है औऱ आगे बढ़नें का मार्ग भी प्रशस्त करती है। सरल और सुव्यवस्थित विचारों से ही समाज की दिशा और दशा दोनो बदलती है। 

उक्त लेख को दैनिक जागरण, कानपुर संस्करण नें अपनें सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 27 जुलाई 2020 को  स्थान दिया है।

तुलसी के प्रिय राम


लेखक
गौरव सक्सेना

संस्कृति की विरासत – नागदेवता

Gaurav Saxena

 
संस्कृति की विरासत – नागदेवता

संस्कृति की विरासत – नागदेवता

पूर्व से ही नाग भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा रहे है। और पौराणिक कथाओ में मनुष्य द्वारा नाग को देवता के रूप में पूजा गया है। परन्तु इन्हे पूजित करनें के साथ-साथ इनके प्रति हो रहे अमानवीय व्यवहार को नकारा नही जा सकता है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम और अन्य सरकारी प्रयासों में सेंध मारते मानव के रूप में दानवो नें नागो को व्यापारिक लाभ के लिए पूर्व से ही इन्हे मारकर इनकी खाल और विष को अंतरराष्ट्रीय बाजार में चोरी छिपे खरीदना और बेचना शुरू कर दिया है।   


नागों के संरक्षण के लिए कार्यरत संस्थाये इनके जीवन को बचानें के लिए अथक परिश्रम भी कर रहीं है, जिसके लिए वे बधाई के पात्र है। परन्तु इनके जीवन को बचानें के लिए सरकार के साथ-साथ मानव को भी आगे आना होगा, आपके थोड़े से प्रयास से इनका जीवन बच पायेगा और हमारी भारतीय संस्कृति भी सुरक्षित रह पायेगी। हमें चाहियें की हम इनकी खाल से बनी वस्तुओं को बाजार से खरीदना बन्द कर दे  तथा यदि यह नाग हमारे घरों पर या आस-पास दिखाई पड़े तो इन्हे पकड़नें हेतु वन विभाग को सूचित करें तथा स्वंय इनका वध न करें, याद रखियें कोई भी जीव अकारण मानव पर आक्रमण नही करता है, मानवीय दखलअन्दाजी और छेड़खानी ही इन्हे स्वयं के बचाव के लिए आक्रामक बनाती है। 


कल 25 जुलाई को नाग पंचमी का पावन पर्व है, हिन्दू धर्म में सावन मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागों की पूजा अर्चना करना पूर्व काल से ही चला आ रहा है। इस दिन घरों के दरवाजे पर प्रतीकात्मक रूप से नागों के चित्र बनाकर विशेष पूजा अर्चना की जाती है तथा उनसे मानव कल्याण के लिए प्रार्थना भी की जाती है। पूर्व की एक कहानी है कि एक लीलाधर नाम का किसान अपनें खेतो पर हल चला रहा रहा था, तभी अन्जानें में उसके हल से खेतों में नाग के बच्चो की मृत्यु हो गयी थी, और फिर नाग माता नें रात्रि में बदला लेनें के लिए किसान के बच्चों सहित परिवार के सभी सदस्यों को डस लिया था, किसी तरह से  सिर्फ एक लड़की बच गयी, जिसनें अगले दिन रात्रि में नाग माता के लिए पकवान बनाकर घर के दरवाजे पर रक्खे, नाग माता दोबारा उस लड़की को डसने के उद्देश्य आयी और लड़की की पूजा अर्चना से खुश होकर उन्होनें लड़की को जीवन दान दिया और आर्शीवाद भी दिया जो नाग पंचमी के दिन नागो की पूजा- अर्चना करेगा उसके पूरे परिवार पर नाग देवता की कृपा रहेगी,  तथा उसे कुंडली में सभी प्रकार के नाग दोषों से भी मुक्ति भी मिलेगी।


आईये, हम सभी मिलकर के भारतीय संस्कृति में देवत्व नागो को समाज में मान्यता दे और इनके सरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायें, और अपनी संस्कृति को संजोये।


नाग पंचमी पर्व पर मेरे उक्त लेख को दैनिक जागरण कानपुर संस्करण नें अपनें पृष्ठ संख्या 2 पर स्थान दिया।

 



संस्कृति की विरासत – नागदेवता


लेखक
गौरव सक्सेना 

“नीरज” जी आज भी दिलों में जिन्दा है.......................

Gaurav Saxena


नीरज जी आज भी दिलों में जिन्दा है.......................


“नीरज”  जी आज भी दिलों में जिन्दा है.......................


महाकवि गोपाल दास नीरज जी का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद के पुरावली गॉव में हुआ था, अपनी लेखनी से देश विदेश में नीरज जी ने जो नाम कमाया है उससें छोटे से जनपद इटावा का नाम भी रोशन हुआ है। वे ऐसे सर्वप्रथम व्यक्ति थे, जिन्हे शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा दो बार सम्मानित किया गया था। भारत सरकार नें उन्हे पद्मश्री व पद्म भूषण पुरुस्कारों से नवाजा था, यश भारती पुरुस्कार से भी उन्हे अलंकृत किया गया था। हिन्दी गीतो की नीरज जी के बिना कल्पना भी नही की जा सकती है। हमेशा उनकी लेखनी आम आदमी की व्यथा, सामाजिक कुरीतियों और जागरूकता पर आधारित रहती थी। लेखनी में शब्दों के चयन करनें का सलीका और जनसन्देश देनें के सम्मिलित मिलेजुले भाव नें ही उन्हे जनमानस के मध्य लोकप्रिय बनाया था। जलाऔ दीये पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए जैसे गीतो से समाज में जागरूकता फैलाना तो कोई नीरज जी से सीखें। साहित्य की दुनियां ही नही उन्होनें फिल्मी दुनियां में भी अपनी लेखनी का लोहा मनवाया है। कई हिन्दी फिल्मों में अपने गीत देकर नीरज जी नें उन्हे भी अमर कर दिया।


शोखियों मे घोला जाए फूलों का शबाब, ए भाई जरा देख के चलों, बस यहीं अपराध मैं हर बार करता हूं, दिल आज शायर है जैसे बेहतरीन नगमें आज भी हर उम्र के लोगो की जुबान पर है। इन्हे हर कोई आज भी बड़ी शिद्दत के साथ गुनगुनाता रहता है। हर आदमी को आज भी लगता है कि जैसे नीरज उनकी ही जीवनी को लिख रहे हो। फिल्म जगत में भी उनके योगदान के लिए उन्हे तीन बार फिल्म फेयर पुरुस्कार से नवाजा गया। 


उनकी काव्य पाठ से श्रौतागण मंत्र मुंग्ध होकर एक अलग दुनियॉ में खो जाते थे। उन्हे यदि जन कवि की संज्ञा दी जायें तो अतिश्योक्ति नही होगी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर नें उन्हे हिन्दी की वीणा कहकर सम्मानित किया था। 


19 जुलाई 2018 को इस जन कवि, गीत की गंगौत्री नें अन्तिम सांस ली थी, आज नीरज भले ही हमारे बीच न रहे हो, परन्तु उनकी लेखनी आज भी जीवित है। दिलों में राज करते उनके गीत आज भी लोगो के मध्य जीवित है। आम आदमी की व्यथा को अपनी लेखनी से अमर करनें वाले नीरज सदैव हमारी स्मृतियों में जीवित रहेगे। आज हम सभी को उनकी लेखनी से प्रेरणा लेनी चाहियें, यहीं उनके प्रति हमारी सच्ची श्रृदांजलि होगी।  



लेखक
गौरव सक्सेना

पुन: लॉकडाउन -- हमारी लापरवाही का ही नतीजा है

Gaurav Saxena

 पुन: लॉकडाउन -- हमारी लापरवाही का ही नतीजा है

पुन: लॉकडाउन -- हमारी लापरवाही का ही नतीजा है


आज देश अनलॉक की प्रकिया से गुजर रहा है। लॉकडाउन के कारण बन्द पड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए धीमें – धीमें गतिविधियों का पुन: प्रारम्भ करना अति आवश्यक हो गया था। परन्तु वहीं इसका एक अति दुखी कर देने वाला पहलू भी सामनें आया है कि लोगो की घर से बाहर निकलनें की आवाजाही और कोरोना के प्रति असंवेदनशील लापरवाही भरे रवैये नें भारत में कोरोना संक्रमण की स्थिति में बेतहासा वृद्धि की है। थोड़ी सी छूट देनें भर से लोगो ने इसका गलत फायदा उठाया और स्थिति हाथ से बाहर होती दिख रही है, बाजारों में दो गज की दूरी को लोग भूलकर कमानें खानें की होड़ में लग गये है। माना कि पेट पालनें के लिए रोजगार जरूरी है परन्तु इस कठिन समय में जब हम एक लम्बे लॉकडाउन के बाद घर से बाहर आये है तब रोजगार से कहीं ज्यादा संक्रमण से बचाव है। हमारी थोड़ी सी लापरवाही लॉकडाउन काल के हम सभी के परिश्रम को पूर्णतया नष्ट्र कर देगी।   

चूंकि यह संचारी रोगो के प्रसार का समय भी चल रहा है ऐसे समय में कोरोना संक्रमण और अत्यधिक गति से फैलेगा। तब हमें पहले से ज्यादा जिम्मेदारी के साथ बचाव करना है। यदि हम रोज की जिन्दगी में कोरोना को नजरअन्दाज कर देगे तो इसके घातक प्रभाव सभी को भुगतनें होगे।
आज कोरोना के बढ़ते संक्रमण के चलते कई राज्यों औऱ शहरों में पुन: लॉकडाउन लगाया जा रहा है, उत्तर प्रदेश सरकार सप्ताह में शनिवार और रविवार को पूर्णतया लॉकडाउन करनें का फैसला कर चुकी है। जरा सोचिये कि लॉकडाउन काल में लोगो की जिन्दगी सरकारी मद्द के बाबजूद भी किस तरह से परेशानी में व्यतीत हुई थी, और फिर हम सभी की वजह से ही पुन: लॉकडाउन की राह पर चलना, अब और कितना कष्ट्रकारी रहेगा। 

सरकार अपनी क्षमता से अधिक कोरोना पर विजय पानें के लिए रात-दिन कार्यरत है, निरन्तर बढ़ती कोरोना टेस्टिंग, स्वास्थ्य उपकरणों का स्वदेशी निर्माण, अत्याधुनिक टेस्टिंग प्रणाली सभी पर सरकार पूरी ताकत के साथ काम कर रही है। और देश में संक्रमणमुक्त होते लोगो की संख्या सरकार के प्रयासों को फलीभूत होते दिखा रही है। 

अब बिना किसी देरी से हम सभी को कोरोना को हरानें के लिए कमर कसनी होगी तथा यह प्रण करना होगा कि अनावश्यक कार्य से घर से बाहर कदम नहीं रखना है और यदि बाहर जाये तो मास्क से नांक और मुख को अच्छी तरह से ढ़ककर ही जायें, दिखावे के लिए या पुलिस से बचनें के लिए मास्क नही लगाना है बल्कि संक्रमण रोकनें के उद्देश्य से मास्क का प्रयोग करना है। वहीं दो गज की दूरी का कठोरता के साथ पालन करना है। 

उक्त लेख को दैनिक जागरण समाचार पत्र नें दिनांक 18 जुलाई 2020 को अपनें सम्पादकीय पृष्ठ पर स्थान दिया।

पुन: लॉकडाउन -- हमारी लापरवाही का ही नतीजा है


लेखक
गौरव सक्सेना

भारत के लिए घातक - जनसंख्या बिस्फोट

Gaurav Saxena


भारत के लिए घातक - जनसंख्या बिस्फोट


जनसंख्या के प्रति लोगो को जागरुक करनें के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। आज के ही दिन 1987 में विश्व की जनसंख्या 5 अरब के आंकड़े को पार कर गयी थी, बढ़ती जनसंख्या के प्रति जन जागरुकता के तहत संयुक्त राष्ट्र नें इस दिन को जनसंख्या दिवस के रूप में मनानें की निर्णय लिया था। वास्तव में देखा जाये तो बढ़ती जनसंख्या किसी भी देश के लिए एक विकराल समस्या होती है। 


आज की स्थिति पर नजर डाले तो विश्व की जनसंख्या तकरीबन 7.8 अरब हो चुकी है। भारत मे बढ़ती जनसंख्या एक चिन्तनीय विषय है। बढ़ती जनसंख्या के मामले में हम चीन के बाद दूसरे पायदान पर है। इस विषय पर यदि समय रहते ध्यान नही दिया गया तो नि:सन्देह इसके दूरगामी परिणाम घातक होगे। और वह दिन दूर नही जब हम जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे पछाड़कर शीर्ष पर होगे। 


भारत में संसाधनों की कमी और निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के कारण गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे क्षैत्रों में निरन्तर विकराल समस्याये खड़ी हो रही है। परिवार भरण- पोषण की ज्वलन्त समस्या, घातक बीमारियों के कारण जूझते लोग, स्वच्छ जल और वायु के लिए संघर्षरत आम जन की पीड़ा को विकास की आड़ में अन्देखा तो नही किया जा सकता है। 


इस दिवस को सार्थक रूप देनें के लिए लोगो को अब यह समझना चाहिये कि बढ़ती जनसंख्या देश की प्रगति में एक विकराल समस्या है, इस पर अंकुश लगानें में ही भलाई है। तथा सरकार को भी जनसंख्या नियन्त्रण सम्बन्धी कोई ठोस कदम उठानें चाहियें या कोई कानून बनाना चाहियें, जिससें समय रहते इस समस्या का निस्तारण किया जा सके। और भारत अपनी पूरी ताकत के साथ विकास की राह पर चल सकें। एक बार पुन:  छोटा परिवार, सुखी परिवार को देशव्यापी जागरूकता के तहत प्रचार प्रसार करनें की आवश्यकता है।

लेखक
गौरव सक्सेना

भारत के लिए घातक - जनसंख्या बिस्फोट

मेरे सावन के शिव

Gaurav Saxena


मेरे सावन के शिव
मेरे सावन के शिव


शिव सहज और अत्यन्त सरल स्वभाव के है। जो भक्त द्वारा केवल जल चढ़ाये जानें मात्र से ही खुश हो जाते है और अपनें भक्तो की समस्त मनोकामना पूर्ण करते है। बेल पत्र अर्पण से तो प्रभु भक्त के वशीभूत हो जाते है। पुराणों में शिव को महादानी भी बताया गया है अर्थात भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ भक्त पर अपनी कितनी कृपा बरसा सकते है इसकी कल्पना भी नही की जा सकती है। यहीं कारण भी रहा है कि असुर सदैव शिव को प्रसन्न करनें हेतु शिव पूजा करते थे तथा शिव आर्शीवाद प्राप्त भी करते थे। 


स्वंय लंकापति रावण भी शिव का भक्त था और शिव को प्रसन्न करनें हेतु अपनें शीश काट-काट चढ़ाता था, उन्हे प्रसन्न करनें हेतु नृत्य करके रिझाता था, शिव ताण्डव स्त्रोत्र की रचना स्वंय रावण नें भगवान शिव को प्रसन्न करनें के लिए की थी। भगवान भोलेनाथ नें भी रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर अपनी सोने की लंका रावण को दान में दे दी थी, तभी से रावण सोनें की लंका का अधिकारी हो गया था। गोस्वामी तुलसीदास जी नें रामचरित्रमानस के सुन्दरकाण्ड में लिखा भी है। जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिए दस माथ, सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ। भावार्थशिवजी ने जो संपत्ति रावण को दस सिरों की बलि देने पर दी थी, वही संपत्ति श्री रघुनाथजी ने विभीषण को बहुत सकुचाते हुए दी, जैसे कि यह बहुत तुच्छ वस्तु दी हो।भोलेनाथ के लिए सभी भक्त समान है चांहे कोई देवता हो, दानव हो या कोई मानव सभी पर अपनी अविरल कृपा बरसाते रहते है। 


इस समय चातुर्मास का महीना सावन मास चल रहा है जो कि भगवान शिव को अति प्रिय है। पौराणिक मान्यताऔं के अनुसार इन चार माह में सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु क्षीर सागर में विश्राम करते है, सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते है। इसी कारण से इन चार माह में भगवान शिव की साधना, आराधना को अति फलदायी और श्रेष्ठ माना गया है।  
भक्तो को अतिशीघ्र शिव कृपा पाने के लिए इस काल में निरन्तर शिव अर्चना करते रहना चांहिये, तथा पंचाक्षरी मंत्र ऊं नम: शिवाय का जप करते रहना चाहियें। 

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण कानपुर संस्करण नेे अपनें पृष्ठ संख्या 2 पर दिनांक 09 जुलाई 2020 को स्थान दिया है।

मेरे सावन के शिव


(लेखक)
गौरव सक्सेना

मेरे सावन के शिव

जल है तो कल है........................

Gaurav Saxena



जल है तो कल है........................

जल है तो कल है........................


            मनुष्य के साथ- साथ प्रकृति भी अपना आनन्दोत्सव मनाती है, फर्क इतना है कि मनुष्य केवल लीक पीटता है और प्रकृति वातावरणीय सन्तुलन बनाती है। अभी प्रकृति का उत्सव अर्थात वर्षाकाल हमारे चौबारें को भिंगो रहा है, यह वह सुखद और मनोहारी समय है जब मेघों से अमृतरूपी जल धरती पर बरसता है और सम्पूर्ण धरा को सिचिंत करता है। मनुष्यों के साथ- साथ अन्य समस्त जीवधारी इस वर्षा में अपनें आप को भिगोनें की एक चाहं रखते है। लेकिन अन्य समस्त जीवधारियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान है जो अपने वर्तमान और भविष्य को भलीभांति समझता है। 


            लेकिन अफसोस है कि मनुष्य इस अमूल्य जल के महत्व को निरन्तर अनदेखा करता चला जा रहा है। जैसे जिम्मेदारियों से दूर भागकर भविष्य में जल संकट को झुठलाया जा सकता हो, यह एक बेहद कटु सत्य है कि धरती पर पीनें योग्य जल क्षेत्र निरन्तर सिकुड़ते जा रहे है और विकास के नाम पर अन्धाधुंध प्राकृतिक दोहनकारियों के लिए यह कड़ी चेतावनी है कि जल एक सीमित प्राकृतिक संसाधन है और इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है। तकनीकी के बढ़ते कदम भी आज जल निर्माण नही कर सकते है। अत: हर हाल में हमें जल की बर्बादी रोकनी होगी, प्रकृति से स्वार्थवश नही अपितु जीवन दायिनी मॉ के रूप में जुड़ना होगा। 


            आज और अतीत में अगर जल की महत्ता के सन्दर्भ में विश्लेषण करें तो पायेगे कि कैसे हमारे पूर्वज जल को देवता के रूप में मानते थे, जल संसाधनों का समाज में हर कोई सम्मान करता था, जल श्रोत्रो के निरन्तर संरक्षण औऱ संवर्धन के लिए समाज में एक जन भागीदारी दिखाई देती थी, जो कि आज समाज से नदारत हो गयी है। पर्यावरण प्रेमियों औऱ सरकारी तंत्र के जल संरक्षण के सराहनीय कार्य बढ़ते जल प्रदूर्षण को रोकनें के लिए तब तक सफल नही हो पायेगे जब तक हर एक नागरिक जल संरक्षण की सौगन्ध न खायें, और अपनें जीवन में संकल्पवद्ध न हो।


जल है तो कल है........................




           जरा सोचिये, कि हम घरों में कैसे जल की निरन्तर बर्बादी करते चले जा रहे है, जितना पानी इस्तेमाल होता है उसका कई फीसदी गंदा होकर नाली में बह जाता है। अपने आप से प्रश्न करनें का समय आ गया है कि इस प्रकार से यदि जल की बर्बादी हम करते गये तो आगे आनें वाली पीढ़ियों को हम क्या देकर जायेगे, जो कि हमें भी अपनें पूर्वजों से विरासत में मिली थी। कम से कम जल को ही विरासत के रूप में संरक्षित कर लीजिए। 
आईयें मिलकर के अपनी धरा पर जल संरक्षण को नैतिक कर्तव्य के रूप में आत्मसार करें तथा जल संरक्षण और इसकी निरन्तर बेतरतीब बर्बादी पर रोक लगायें। तथा समाज में जल के महत्व के प्रति जन- जागरूकता फैलायें।



जल है तो कल है........................


लेखक
गौरव सक्सेना

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