मॉ, भारतीय रेलवे के अलावा इस संसार में अपना कौन है ?

बेटी ही सबसे बड़ा दहेज होता है

हुजूर, आपके तबज्जों का इन्तजार है .........................

अकबर का मकबरा सिकन्दरा, आगरा

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हिन्दी नही, हमारी मानसिकता छोटी है।

Gaurav Saxena

 

हिन्दी नही, हमारी मानसिकता छोटी है।


हिन्दी नही, हमारी मानसिकता छोटी है।


प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस इस उद्देश्य के साथ मनाया जाता है कि आम जनमानस के मध्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान बढ़े तथा सम्पूर्ण देश –विदेश में हिन्दी को लोग अपनायें और यह जन-जन की भाषा बन सकें। परन्तु असन्तोष का विषय है कि अपनें ही देश में हिन्दी अन्य विदेशी भाषाओं के मध्य परायी सी लगती है। अपनें अस्तित्व को लेकर हिन्दी स्वयं संघर्षरत है। प्रतिवर्ष हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन के रूप में किये गये प्रयास हिन्दी की वर्तमान स्थिति के सामनें बौने नजर आते है। 


यह एक अत्यन्त चिन्तनीय विषय है कि हमारे समाज में विदेशी भाषा को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया गया है, तथा समाज में विदेशी भाषा के प्रयोग का इतना बोल-बाला बढ़ गया है कि लोग हिन्दी में बात करनें तक में स्वंय को अपमानित महसूस करनें लगे है। और पराई भाषा का प्रयोग कर स्वंय को गौरवान्वित महसूस करते है। 


जबकि हिन्दी भाषा का अपना एक बहुत पुराना इतिहास रहा है। इसके लिखनें और पढ़नें वालों नें इसे अपनी मॉ माना है तभी इसके प्रेमियों ने इसे विदेशो तक में सम्मान दिलवाया है। विदेशो में आज हिन्दी सिखानें के लिए केन्द्र खोले जा रहे है। हिन्दी के जानकारों की मांग दिनों-दिन बढ़ रही है, लेकिन अफसोस कि हमारे देश में हिन्दी को छोटे दर्जे की भाषा समझा जाता है। हिन्दी छोटी नही है, हमारी मानसिकता ही छोटी है। 


यह हिन्दी भाषा का ही प्रभाव है कि इसनें सदैव अन्य भाषाओं को बिना किसी भेदभाव के अपनी अविरल गंगौत्री में प्रवाहित होनें दिया है। हिन्दी के वर्चस्व को बचानें के लिए सिर्फ संकीर्ण मानसिकता को परिवर्तित करने की आज महती आवश्यकता है। जरूरत है बिना किसी संकोच के साथ हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने की, हिन्दी बोलते समय स्वयं को गर्वित महसूस करे। हिन्दी को सहर्ष ह्दय में स्थान दीजिये ताकि हिन्दी फिर कोई नागार्जुन, दिनकर, महादेवी वर्मा, रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय पैदा कर सकें। फिर किसी हामिद की गरीबी को कोई प्रेमचन्द्र मिल सकें।


लेखक एवं समाजसेवी
गौरव सक्सेना

स्वाद के साथ- साथ अपनापन भी चला गया

Gaurav Saxena

                                         स्वाद के साथ- साथ अपनापन भी चला गया

स्वाद के साथ- साथ अपनापन भी चला गया

 


 

अब देर रात ऑफिस से घर आकर सोशल मीडिया की जिम्मेदारी शायद बूढ़े मॉ- बाप की जिम्मेदारी से बढ़कर हो गयी है। हॉ कमानें खानें के तौर तरीके जो बदल गयें है, शायद हम मार्डन अर्थात आधुनिक जो हो गयें।

क्या आप भी न जानें फिर से आदर्शवादी बाते ले कर बैठ गयें।

नही शकुन्तला मै तंग आ गया हूं इस बदलती अपनों की दुनियॉ से,

भला कब तक नौकरों के सहारे जिन्दा रहूंगा। राम लाल नें एक गहरी सांस लेते हुयें अपनी पत्नी शकुन्तला से कहा....

शकुन्तला - अरें आप परेशान न हो, मै सब कुछ सम्हाल लूंगी।

तभी कमरे के अन्दर से बाई दो खाना की थाली बूढ़े मॉ- बाप को दे कर चली गयी।

दोनो नें एक – दूसरे को देखा और फिर नजरे झुकायें भोजन करना शुरू कर दिया।

भोजन समाप्ति के बाद ही बहू और बेटे का घर के अन्दर प्रवेश करना हुआ, बेटे नें तो फिर भी हमारी खैरियत पूछ ली, परन्तु बहू शायद ज्यादा ही आधुनिक हो गयी थी, तभी सीधे अपनें कमरे में चली गयी।

कैसा खाना बना बाबू जी – बेटे ने पूछा

खाना तो ठीक बना है लेकिन अब खाने में स्वाद नही लगता है, स्वाद ही चला गया है।

तभी कमरें से बाहर निकलती हुयी बहू बोली, बाबू जी स्वाद का चला जाना तो कोरोना के लक्षण हो सकते है, चलो कल आप की जॉच कराते है।

ठीक है बहू कल जॉच करा देना, अब तो स्वाद के साथ- साथ अपनापन भी चला गया है।

किस – किस की जॉच करायी जायेगी...

बाबू जी के शब्दों ने एक खामोशी की लम्बी दीवार खड़ी कर दी थी.......................................

खामोशी में बहू – बेटे पता ही नही चला कब अपनें कमरें में चले गयें। और बाबू जी कल का इन्तजार कर रहे थें।

 

लेखक

गौरव सक्सेना

शिक्षक दिवस पर सुधारों की आवश्यकता

Gaurav Saxena

 

 

शिक्षक दिवस पर सुधारों की आवश्यकता



शिक्षक दिवस पर सुधारों की आवश्यकता


भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस पर शिक्षकों को समाज में सम्मान देनें के उद्देश्य से प्रति वर्ष 5 सितम्बर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 


वास्तव में किसी भी समाज की उन्नति के लिए शिक्षकों की महती भूमिका होती है। और उसकी दी गयी शिक्षा ही मनुष्य को अच्छे बुरे में अन्तर करनें का ज्ञान प्रज्जवलित करती है। हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति गुरूओं का सदैव आदर करती आयी है। गुरू का स्थान राजा से भी उच्च होता था, राजा अपनें राजमहल में गुरू को विशेष स्थान देते थे और राज संचालन नीतियों में गुरू की अपनी अलग महत्ता होती थी। गुरूकुलो में रहकर शिष्य अपने जीवन का एक लम्बा समय ज्ञानार्जन एवं गुरू सेवा में व्यतीत करते थें। स्वयं राजा दशरथ जी नें अपनें पुत्रों को गुरूओं के आश्रम में ज्ञानार्जन के लिए भेजा था। रामचरित्रमानस में यह चौपाई अति प्रसांगिक भी है।

                                          गुरु गृह पढ़न गए रघुराई, अल्पकाल विद्या सब पाई’


परन्तु वर्तमान स्थिति अति विचारणीय एवं चिन्तनीय है कि हम पाश्चात्य संस्कृति में इतनें ज्यादा रमे बसे है कि हम गुरू-शिष्य परम्परा को भूलते जा रहे है। इस महनीय परम्परा को केवल धन से नापा तौला जा रहा है। माना कि जीवकोपार्जन के लिए धन एक नितान्त आवश्यकता है परन्तु शिक्षा को बड़े पैमानें पर केवल व्यवसाय का रूप देना तो केवल तो उन प्रतिभाओँ का गला घोटना है जो धन के अभाव में अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते है। शिक्षा पर तो सभी का पूर्ण अधिकार है, इसमें किसी शिष्य के धनवान होने की प्राथमिकता नही होनी चाहियें।


वहीं आज हमनें शिक्षा का रूप भी परिवर्तित कर दिया है जिसका श्रेय भी पाश्चात्य सभ्यता को ही जाता है। आज समाज में शिक्षा के साथ- साथ संस्कारवान ज्ञान पर भी ध्यान दिया जाना चाहियें, जिससे फिर कभी कोई शिक्षित युवा गलत राह पर न चल सकें। आज समाज के उत्थान में संस्कारवान, व्यवहारिक और रोजगारपरक तकनीकी शिक्षा को बल देने की आवश्यकता है जिससे कि देश का हर एक शिष्य शिक्षित होनें के बाद बेरोजगार न हो तथा संस्कारवान होकर अपनें समाज में प्रकाश फैला सके। 


इस प्रकार के चन्द प्रयासों को यदि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जायें तो नि:सन्देह भारत ज्ञान के बल पर एक बार पुन: विश्व गुरू बननें के पथ पर अग्रसर हो सकेगा।  


लेखक एवं समाजसेवी
गौरव सक्सेना

आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप

Gaurav Saxena

 

आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप


                                                    आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप


अरे बेटा रामलाल, जल्दी उठो और खेतो पर जाकर पानी लगा आओ। वैसे भी इस बार की फसल आवारा पशु ही चर गये है। कई बार तुझसे कहा है कि खेतो पर एक मचान बनवा दो, रात में मैं ही खेतों पर सो लिया करू, कम से कम फसल तो बचेगी। लेकिन तुम्हे तो अपनी नींद और फोन से ही फुरर्सत कहॉ है।
अरे बापू, क्या आपनें तो मेरी नींद खराब कर दी है, और छोटू क्या करता रहता है वह ही खेती वाड़ी का काम देखा करें, मुझे यह खेत-खलियान का काम अच्छा नही लगता है। 


तू बस छोटू से ही चिढ़ता रहना, 2-2 बच्चों के बाप हो गये हो और जरा सी भी समझ नही आयी, अपनें छोटे भाई को तुम हमेशा दुश्मन की निगाह से ही देखते हो। और वह छोटू की उदारता देखों बेचारा दिन-रात ट्यूशन पढ़ाकर पूरे घर का खर्चा चलाता है।

ठीक है बापू, आप तो सदैव छोटू का ही पक्ष लेते हो।
तभी गॉव के जमींदार दीना का आना हुआ, अरे काका क्या बात-चीत हो रही है रामलाल सें।
अरे, कुछ नही घर गृहस्थी की बाते है और क्या, काका नें गृह क्लेश की बातों को ढ़ाकते हुये कहा....
सब ठीक-ठाक तो है ना घर में, जमींदार दीना नें पूछा ?


हॉ सब कुशल मंगल से है। तुम सुनाओ, आज सवेरे- सवेरे कैसे आना हुआ।
अरे कुछ नही काका किराये पर ट्रैक्टर कर रहा था, फसल को शहर जाकर बेंच आता।
तो सोचा कि काका आप से भी पूंछ लूं, आपको भी फसल बेचनी हो तो हम दोनो लोग मिलकर ट्रैक्टर का खर्चा आपस में आधा- आधा बांट लेगे तो मुझे भी थोड़ी राहत मिल जायेगी।
अरे, बिल्कुल दीना तुमने ठीक सोचा। मै अभी तुम्हे कुछ पैसे दे देता हू बांकी फसल बेंचकर उसी दिन दे दूगा।
कोई बात नही काका, घर पर जो थोड़ा बहुत पड़ा हो वहीं दे दो।
तुम यहीं रूको मै आता हूं..........


काका नें बरामदे में जाकर रामलाल को बात बतायी और रामलाल से कुछ रूपये दीना को देनें के लिए मांगे, तो स्वभाव के अनुरूप रामलाल आना-कानी करनें लगा, बड़ी मुश्किल से उसनें पैसे अपनें बापू को दियें, क्योकि वह चांह रहा था कि इसके पैसे भी उसका छोटा भाई ही खर्च करें परन्तु छोटा भाई आज घर पर नही था वह रेलवे की परीक्षा देनें शहर गया था।    


यह लो बेटा दीना कुछ रूपये लेकर ट्रैक्टर वाले को अगले हफ्ते सोमवार को बुला लो। तुम्हारे साथ यह दोनो भाई भी शहर जाकर फसल बेंच आयेगे। वैसे भी इस बार तो ना के बराबर फसल हुयी है।  
हा काका चलता हू सोमवार को भुरारे (सुबह) ही आ जाऊंगा।
रामलाल भी बेमन से उठकर खेतो पर पानी लगानें चला गया............ 


अगले हफ्ते रामलाल नें ट्रैक्टर वाले के आनें से पहले ही जान-बूझकर उसी समय अपनें छोटे भाई को बहाने बनाकर गॉव के मास्टर जी के पास भेज दिया कि उनके पास से मिठाई (गुड़) ले आओ....
छोटे भाई के जाते ही ट्रैक्टर वाला आ गया, अब क्या रामलाल ने दीना की मदद से अनाज ट्रैक्टर में डाला और शहर को रवाना हो चला ...


दीना के पूछनें पर उसनें कहॉ कि छोटू जरूरी काम से गया है पीछे से आता होता, मंडी में ही मिल जायेगा।
छोटू मास्टर जी के घर से वापस लौटा तो पता चला कि उसका भाई फसल लेकर ट्रैक्टर से शहर चला गया। निराश हो छोटू कुछ दूर पैदल चलकर तो कुछ दूर अन्य राहगीरो की साईकिल पर बैठकर जैसे-तैसे मंड़ी पहुंचा तो दोपहर हो चुकी थी तब तक उसका भाई रामलाल फसल बेंच भी चुका था, क्योकि रामलाल की चालाकी तो जग जाहिर थी। 


शाम को भी वापसी में रामलाल नें फिर नयी चाल चली कि छोटू तुम सब्जी लेकर आऔ हम मंड़ी चौराहे पर तुम्हे मिल जायेगे, तब घर चलेगे। छोटू अपनें भाई की चालाकी को अच्छी तरह समझता था लेकिन घर में शांति रहे, इसलिए कड़ी मेहनत करता था और अपनें भाई से भी किसी भी प्रकार की तर्क-वितर्क नही करता था। क्योकि उसे अपने खडूस भाई का व्यवहार अच्छी तरह से पता था। आज सुबह ही उसकी चालाकी का शिकार छोटू हो चुका था। बाजार में सब्जी खरीदनें में छोटू को कुछ समय अधिक लग गया। 


खैर छोटू सब्जी खरीदकर चौराहे पर पहुंचने वाला ही था कि रामलाल ने दूर से ही छोटू को आते देख दीना से बाते बनाकर बोला कि पता नही छोटू कहॉ रह गया, देर हो रही है।
जरूर अकेले में चट्टा चपट्टा खा रहा होगा। चलो दीना भाई ट्रैक्टर आगे बढ़वाओ, नही तो घर पहुचंते रात हो जायेगी। छोटू कोई सवारी से आ ही जायेगा।
दीना रामलाल की चालाकी को नही समझ पाया और वह ड्राईवर के बगल वाली सीट पर बैठकर ट्रैक्टर में तेज बजते गानों का आन्नद लेनें लगा। 


ट्रैक्टर धीमे- धीमें बढ़नें लगा, और पीछे उसकी ट्राली में अकेले बैठा रामलाल खुश था, क्योकि वह चाहंता था कि उसका भाई ट्रैक्टर में ना बैठे, क्योकि ट्रैक्टर के किरायें में पैसे सिर्फ रामलाल नें खर्च किये थे, रामलाल की मानसिकता कितनी संकीर्ण हो सकती है इसका अन्दाजा भी नही लगाया जा सकता। 


पीछे भागते हुये छोटू नें ट्राली को लपक कर पकड़ कर चलते ट्रैक्टर में चढ़ना चाहा तो रामलाल नें अपनी दुष्टता का परिचय देते हुये उसका हाथ इस अन्दाज से पीछे झटक दिया कि उसका यह कृत दीना और ड्राईवर भी न देख सकें। और ट्रैक्टर अपनी गति से बढ़नें लगा। 


बेचारा छोटू पैदल ही घर के लिए चल दिया और पीछे मुड़कर अन्य सवारी को देखता कि कोई सवारी मिल जाये तो समय से घर पहुंच जायें। क्योकि उसके गॉव तक इक्का-दुक्का ही वाहन चलते थें। और शाम को सवारी भी नही चलती थी। 


छोटू के लिए उसके भाई का स्वभाव कोई नयी बात नही थी, और वह अपनें भाई के बुरे आचरण का आदी भी हो गया था। तकरीबन घन्टे भर के पैदल सफर नें छोटू को थका डाला था। तभी अचानक छोटू की नजरों नें देखा कि वहीं ट्रैक्टर कीचड़ में फसा है और उसका भाई रामलाल, दीना और ड्राईवर तीनों मिलकर उसे बाहर निकालनें की असफल कोशिश कर रहे है। पास पहुंचनें पर दीना बोला- अरे छोटू कहॉ रह गये थे, क्या सब्जी लेनें लगे थे, हमनें तुम्हारा इन्तजार भी किया तुम्हे देर लग रही थी, इसलिए हम लोग गॉव वापसी के लिए निकल पड़े।
चलो कोई बात नही, छोटू नें कहा। 


दीना बोला कि छोटू तुम मदद करों तो यह ट्रैक्टर निकल सकें और हम लोग समय से गॉव पहुंच सकें।
छोटा नें हस कर कहा – बिल्कुल मैं मदद करता हूं.....
थोड़ी देर की मेहनत और छोटू की सूझबूझ से ट्रैक्टर कीचड़ से बाहर आ गया तो दीना नें छोटू से पीछे ट्राली में बैठनें को कहा।


छोटू अपनें भाई रामलाल के सामनें पीछे ट्राली में बैठ गया। दोनो भाई शान्त थें।
रामलाल अपनें छोटू को चुपचाप देखता जा रहा था, शायद अब उसके पास कुछ बोलनें को था भी नही..........................
शायद रामलाल अपनें कृत्य पर शर्मिन्दा था और पश्चाताप कर रहा था..............
रिश्तो से प्रेम कब समाप्त हो गया पता ही नही चला, लेकिन शायद छोटू जैसे भाईयों की उदारता अब भी दिलों में जिन्दा है।

लेखक
गौरव सक्सेना


 

 

 


सफल चुगलखोर (व्यंग लेख)

Gaurav Saxena

 

सफल चुगलखोर (व्यंग लेख)



सफल चुगलखोर (व्यंग लेख)

 
 

कोरोना महामारी के चलते मैं अत्यन्त परेशान हूं क्योकि बिना घुमक्कड़ी के लेखनी में नवाचार नही आता जिससें पाठको की भीड़ जुटा पाना भी काफी मुश्किल हो जाता है। खैर, अब अनलॉक हो रहा है तो मैं भी धीमें- धीमें अपनी लेखनी को अनलॉक कर रहा हूं तथा नवीन लेख लिख रहा हूं। मैने अपनें लेख का शुभारम्भ किया ही था तभी मेरा पुराना चेला कनचप्पा लाल आ धमका, उसका यह नामकरण मेरे द्वारा प्रदत्त हास्यपद उपहार ही है। 


आऔं कनचप्पा, बताओ कैसे आना हुआ ? सब कुध ठीक-ठाक चल रहा है ना..
अरे नही गुरूदेव, बहुत परेशान हूं नौकरी पेशा में भी बहुत परेशानी आ रही है। गुरूदेव आप ही कुछ हल निकालिए कि जिससे मेरी बेपटरी की जिन्दगी पटरी पर आ जायें, कोई सफलता का शोर्टकट उपाय बताइये या कोई शोर्टकट कोर्स बताइये।


देख बेटा कनचप्पा, वैसे तो बाजार में शोर्टकट कई कोर्स चल रहे है पर वह सफलता दिलवानें का दावा तो करते है लेकिन उनके दावे वैसे ही उखड़ते दिखायी पड़ते है जैसे पहली बरसात के बाद नई नवेली सड़क।
तभी तो गुरूदेव मैं आपके पास आया हूं....


देखो एक बहुत पुराना और पेटेन्ट तरीका बताता हूं जो हिडिन रूप में देशी बाजार के साथ-साथ अर्न्तराष्ट्रीय बाजार में भी खूब चल रहा है।
जी जी, यह कौन सा कोर्स है जल्द बताइयें .....
कनचप्पा, जल्द का काम शैतान होता है... मैनें हल्की सी डांट लगाते हुये कहा
क्षमा गुरूदेव, क्षमा ...आप आराम से इसका बखान करें............
कनचप्पा, आज सफलता का सबसे प्रभावी और शोर्टकट तरीका है चुगलखोरी ...


आज से तुम चुगलखोरी करना प्रारम्भ कर दो, फिर देखो कि तुम्हारी रूकी गाड़ी कैसे दौड़ती है।
लेकिन गुरूदेव आप इस नवीन शब्द को और अधिक स्पष्ट करें तथा इसके प्रभाव भी बतायें।


नही नही बेटा कनचप्पा, चुगलखोरी को नवीन शब्द समझनें की जरा सी भी भूल मत करना। यह अति प्राचीन और सफल तरीका है जिसे अपनानें के बाद कोई भी रंक मंत्री बन जाता है, रातो रात लोगो की किस्मत बदल जाती है। विभागो में तो यह पदोन्नति व वेतन वृद्धि में रामवाण औषधि के रूप में संजीवनी का काम करती है। सरल भाषा में कहे तो किसी बड़े अधिकारी से भी बात करनें के लिए तुम्हे किसी चुगलखोर के जरियें ही गुजरना होगा, और उसकी सुविधा शुल्क रूपी दक्षिणा देनें के बाद तुम्हारे सभी काम चुटकियों में पूरे हो जायेगे।


आज चुगलखोरी एक साइड बिजनिस के रूप में खूब फल-फूल रहा है, क्योकि इसमें नाम के साथ- साथ ऊपरी कमाई भी रोज होती है। बिना पड़े लिखे लोग भी पढ़े लिखो के कान काट रहे है और तुम तो फिर भगवान कृपा से ग्रेजुएट हो। इस तरह से तुम कहलाओगे एक ग्रेजुएट चुगलखोर....


एक ओर नया नामकरण... यह क्या गुरूदेव .......
अरे बेटा, यह नामकरण ही तुम्हारा कल्याण करेगा और इसे तुम मेरा उपहार ही समझों... लेकिन मुझे इसमें करना क्या होगा..........कनचप्पा नें अति उत्सुकता के साथ पूछा ?
यह तुम्हारा प्रश्न अति उत्तम है, ध्यान से सुनों .....


इसमें करनें के लिए तुम्हे अपनें आस-पास के लोगो की छोटी-छोटी बातो को अपनें अधिकारी तक पहुंचाना होगा वो भी थोड़े मिर्च मसाले के साथ और बढ़ा-चढ़ा कर इधर की उधर बाते करनी है या सीधे तौर पर कहे तो चुगलखोरी करनी है। 


ठीक है गुरूदेव, ठीक है मैं आपके गूढ़ ज्ञान को समझ गया, कृपया मुझे अपना आर्शीवाद प्रदान करें जिससें मै एक सफल चुगलखोर बन सकूं...


मेरा आर्शीवाद तो सदैव तुम्हारे साथ है, चुगलखोरी के रुझान तुम्हे शुरूआती दिनों में ही मिलनें लगेगे तो तुम अपनें गुरूदेव को भूल मत जाना, और इससे अर्जित लाभ का व्यौरा बताने जरूर आना, यहीं तुम्हारी असली गुरू दक्षिणा होगी।


ठीक है गुरूदेव, जैसी आप की आज्ञा
इस प्रकार कनचप्पा गुरू से आशीष लेकर निकल पड़ा एक सफल चुगलखोर बननें।



लेखक
गौरव सक्सेना


स्वच्छता ही जीनें की कला

Gaurav Saxena

 

स्वच्छता ही जीनें की कला

 
मध्य प्रदेश के शहर इन्दौर को देश के सबसे स्वच्छ शहर के खिताब से नबाजा गया है, स्वच्छ सर्वेक्षण 2020 के जारी परिणामों मे एक बार फिर इस शहर की स्वच्छता नें इसे यह मुकाम दिलवाया है। लगातार चार बार देश का सबसे स्वच्छ शहर का खिताब भी इन्दौर के पास ही है। इन्दौर नें देश के 4242 शहरों को पीछे छोड़ते हुयें अपने स्थान को कायम रक्खा।



नि:सन्देह इसका श्रेय वहॉ के नगर निगम और नगरवासियों की स्वच्छता के प्रति बलवती इच्छाशक्ति और आपसी समन्वय को ही जाता है। इस सर्वेक्षण में भारत के अन्य शहरों की स्वच्छता के प्रति सुधरती स्थिति सुखद है, लेकिन आवश्यकता है कि आज इन्दौर जैसे भारत के सभी शहर स्वच्छ हो अर्थात पूरा देश ही स्वच्छ हो, और भारत स्वच्छता के लिए देश-विदेश में अपनी एक अलग छाप छोड़ सकें। 



स्वच्छता किसी भी शहर व देश के लिए एक अहम स्थान रखती है जिसका सीधा प्रभाव हमारे पर्यावरण पर पड़ता है। स्वच्छ वातावरण में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क का विकास होता है। और स्वस्थ्य मस्तिष्क ही असाधारण उपलब्धियां प्राप्त करता है। जो किसी देश के विकास में एक अहम भूमिका निभाता है।
आज इन्दौर शहर देश के सभी शहरों, गांव, कस्बो के लिए एक उदाहरण बन गया है। हमें इन्दौर की तरह ही स्वच्छता में जन भागीदारी दिखानी होगी। 



स्वच्छता जैसे अहम विषय पर केवल सरकार की भागीदारी सुनिश्चित करना जन- भागीदारी से पीछे भागना ही होगा। अपनें अन्दर से ही स्वच्छता की भावना को जन्म देकर प्रसार करना होगा तथा स्वच्छता के लिए प्रशासन के साथ कदम मिलाकर चलना होगा। घरेलू कचरा निस्तारण के लिए नियत स्थान पर ही कचरा डालना होगा तथा पर्यावरण अनुकूल वस्तुऔं का अत्यधिक प्रयोग करना होगा जिससे पर्यावरण भी स्वच्छ एवं सन्तुलित बना रहेगा तथा जब हम लोग स्वच्छता से रहेगे तो नि:सन्देह बीमारिया भी कम होगी और हम लोगो का मन प्रसन्नचित्त भी रहेगा। 



इस प्रकार के छोटे- छोटे प्रयासों से नि:सन्देह स्वच्छता की एक मिशाल कायम होगी और उससे सभी को एक नयी सीख मिलेगी। और इस प्रकार से पूरा देश ही स्वच्छता के क्षैत्र में एक परचम लहरायेगा।

उक्त लेख को दैनिक जागरण, कानपुर संस्करण नें अपनें समाचार पत्र के 25 अगस्त 2020  अंक में स्थान प्रदान किया।


लेखक एवं समाजसेवी
गौरव सक्सेना



स्वच्छता ही जीनें की कला

स्वत्रन्त्रता दिवस के प्रति हमारी भागीदारी

Gaurav Saxena

 

स्वत्रन्त्रता दिवस के प्रति हमारी भागीदारी

स्वत्रन्त्रता दिवस के प्रति हमारी भागीदारी
 



आज देश अपना 74वां स्वत्रन्त्रता दिवस मना रहा है और इस शुभ पावन अवसर पर हमारा कर्तव्य बन जाता है कि हम सभी भारत मॉ की  स्वत्रन्त्रता के लिए अमर वीर बलिदानी योद्धाओं, वीर सपूतो और स्वत्रन्त्रता संग्राम सेनानियों को आदरपूर्वक याद करें। जिन्होनें देश की स्वत्रन्त्रता के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर कर दिया था। लेकिन आज के परिवेश में स्वत्रन्त्रता के अर्थ को व्यापक दृष्टिकोण से समझने की नितान्त आवश्यकता है। सर्वप्रथम देश की एकरूपता, अखण्डता और भाईचारे पर सोचना होगा कि क्या हम आजादी के बाद से अब तक इन विषयों पर खरे उतरे है या नही ? इस ओर आज हम सबकों गहन मंथन करना होगा तथा अपनें मन में श्रृद्धा से पूर्ण करनें हेतु संकल्पवद्ध होना होगा।  


किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए एकता एक अहम स्थान रखती है। जिस तरह देश की स्वत्रन्त्रता से पूर्व केवल अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को विध्वंश करना ही हर एक देशवासी का लक्ष्य था और देश प्रेम की बलवती भावना का संचार हर ह्दय में अविरल प्रवाहित होता था, उसमें यकीनन आज कमी दिखायी पड़ती है। स्वत्रन्त्रता दिवस को हम एक सकल्प दिवस तथा प्रेरणा दिवस के रुप में आत्मसार करें।


हमें आज अपनी समस्याओं से ही सीखकर आत्मनिर्भर हो एकजुटता के साथ देश के उत्थान में अपनी–अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। तथा छोटी–छोटी संकीर्ण मानसिकता का परित्याग कर वसुधैव कुटुम्बकम की सोच को अपनाना होगा। किसी भी प्रकार के बहकावे में आकर देश की एकता को खंड़ित होनें से बचाना होगा। समझना होगा कि देश में चन्द कुंठित मनोस्थिति से ग्रसित लोग अपनें स्वार्थवश आये दिन अपनी घटिया सोच का प्रदर्शन करते रहते है। हमें इन सभी से बचना होगा। 


आज सम्पूर्ण भारत को पुन: विश्व गुरू बननें के पथ पर उड़ान भरनी होगी तथा आत्मनिर्भर हो स्वदेशी उत्पादों पर विश्वस्तरीय उपलब्धि भी प्राप्त करनी होगी जिससें कि चंहु ओर देश में खुशहाली हो सके तथा सभी का विकास हो सके। तथा भारत को आज आवश्यकता है कि हम उन वीर सपूतों के अधूरे सपनों को पूरा कर एक नयें भारत का सृजन करें। 


लेखक एवं समाजसेवी
गौरव सक्सेना


हिन्दुस्तान ने खोया शायरी का मशहूर जादूगर – राहत इन्दौरी

Gaurav Saxena

 हिन्दुस्तान ने खोया शायरी का मशहूर जादूगर – राहत इन्दौरी

हिन्दुस्तान ने खोया शायरी का मशहूर जादूगर – राहत इन्दौरी
 

आज हिन्दुस्तान की आंखे नम है, एक शोक लहर का माहौल है। देश नें आज शायरी के एक बड़े हस्ताक्षर राहत इन्दौरी को सदैव के लिए खो दिया है। राहत साहब कोरोना संक्रमित भी थे तथा आज उन्होनें शाम को अन्तिम सांस ली। राहत साहब का इस तरह से जाना वास्तव में देश के लिए एक बड़ी क्षति है। अदब और शब्दो से जिन्दगी को बखूबी शायरी में पिरोह देना तो कोई राहत साहब से ही सीखें। दिल को छू जानें वाले अल्फाज से आम आदमी की जिन्दगी को संजीवनी देने का जो हुनर राहत साहब के हिस्से में था उसकी अब सदैव कमी खलती रहेगी। 

 

उनकी लेखनी में दर्द, जिन्दगी की कस्मकस और अनूठे शिक्षाप्रद एंव तालीमी अनुभवों का पिटारा समाहित होता था, देर रात तक काव्य मंचो को संजीदा बनाकर लोगो की जिन्दगी में उतरना स्वयं में एक अकलपनीय लम्हे होते थे, अब उनकी जगह कोई नही ले सकता है।

 

उन्होनें गंगा जमुनी तहजीब में सदैव समाज को एकजुटता के सूत्र में बांधकर भाईचारे का सन्देश दिया था, हिन्दी व उर्दू भाषा में उत्कृष्ट लेखन के लिए उन्हे कई पीढियों तक याद किया जायेगा।

 

राहत साहब भले ही आज हमारे बीच नही रहे हो परन्तु उनकी बेशकीमती शायरी और लेखन उन्हे अवाम के बीच सदैव जीवित रखेगा। और उन्हे सदैव श्रृद्धा और आदर के साथ स्मरण भी किया जायेगा।


लेखक 

गौरव सक्सेना

 

शबरी की प्रतीक्षित नयनों के नयनाभिराम..................

Gaurav Saxena


शबरी की प्रतीक्षित नयनों के नयनाभिराम..................


शबरी की प्रतीक्षित नयनों के नयनाभिराम..................


आज सदियों से प्रतीक्षित शबरी रूपी नयनों को राम मिल गयें है, आज इक्ष्वाकु वंश के राम की अयोध्या के साथ- साथ तीनों लोक ही राममय हो गये जब भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी नें राम मन्दिर निर्माण की आधारशिला रक्खी, सच्चे अर्थों में यह आधारशिला तो हिन्दू धर्म के मान सम्मान और प्राचीन सनातन धर्म की आधारशिला है जिसके लिए लाखों लोगो नें अपना जीवन न्यौछावर कर दिया था, न जानें कितनें लोगो नें अपनें अरमानों की तिंजाजलि दी थी।

आज अयोध्या नगरी जिस प्रकार से सजी है वैसी शायद ही पूर्व में कभी रही होगी, यह सजावट राम के प्रति अगाध भक्ति और प्रेम को दिखा रही है। वास्तव में राम इस देश की आत्मा है, मनीषा, और सृष्ट्रि के प्राणवायु है, राम हर रूप में विराट और पूर्ण है वह पुत्र, पति, शिष्य, भाई और ईश्वरीय सभी रूपों में मनुष्य को अपना धर्म निभानें के लिए स्वयं को एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित करते है। किसी भी विषम समय में भी साहस के साथ अपनें वचन और धर्म की रक्षा करना ही राम को राम बनाता है, एक राजा होते हुयें अहंकार का शून्य रूप तो केवल राम का विराट ह्दय ही धारण कर सकता है। राम सदैव समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चलते थे, उन्होने लंका विजय मार्ग पर किसी राजा से सहायता न मांग कर वंचितो, दलितो, वानर भालुओ को अपना साथी बनाया तथा एक नायक के रूप में लंका विजयी भी प्राप्त की। उनके अति सरल स्वभाव पर तो उनके भक्तो का सम्पूर्ण जीवन ही न्यौछावर हो जाता है। सारी उपमायें, अलंकार, कलायें और लेखनी राम पर सर्वस्य ही क्यो न लुटा दी जायें तो भी राम की महिमा को पूर्ण नही कर पायेगी।

हम सभी सौभाग्यशाली है और हमारें पूर्व जन्मों का यह प्रतिफल ही है जब हम सभी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनें है कि हमारे नयनों के राम का एक भव्य मन्दिर बन रहा है। आज नि:सन्देह अति आन्नदित क्षण है जब हम अपनें मन मन्दिर के राम के मन्दिर को वास्तविक रुप में बनते देख रहे है। अब आवश्यकता यह भी है कि हम सभी राम को अपना आदर्श मानकर उनके बताये आचरण को धारण कर रामराज की स्थापना भी करें।


इस लेख को  दैनिक जागरण नें पृष्ठ संख्या 6 पर  प्रकाशित किया है।

शबरी की प्रतीक्षित नयनों के नयनाभिराम..................



लेखक

गौरव सक्सेना

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