महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधो की दुनियॉ

 

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधो की दुनियॉ



महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधो की दुनियॉ

बलात्कार जैसे शब्द को यौन शोषण शब्द में परिवर्तित कर दिया गया परन्तु जिस शब्द का समाज में कोई स्थान ही नही होना चाहियें वह शब्द आये दिन न चाहंते हुयें भी कानों में सुनाई पड़ ही जाता है। अखबारों की सुर्खियों में पढ़नें को मिल जाता है। केवल घटना के स्थान बदल जाते है, अपराधियों के नये चेहरे होते है, और शिकार हो जाती है फिर कोई बहिन – बेटी। 


सवाल यह है कि समाज में अपराधियों के अन्दर से कानून का भय दिनों-दिन समाप्त क्यों होता जा रहा है। क्या उन्हे इस कुकर्म की सजा का जरा सा भी अन्दाजा नही होता है। कहीं न कहीं उनके अन्दर कानून की पहुंच से बच निकलनें की गुन्जाइस जिन्दा अवश्य रहती होगी। 


आजादी के इतनें वर्षों बाद भी समाज में इस तरह की घटनाओं का होना नि:सन्देह हमारें देश के विकास में बाधक सिद्ध होगी। जहॉ महिलाओं के प्रति समाज सुरक्षित वातावरण पैदा नही कर पा रहा है। कहीं बलात्कार, तो कहीं दहेज की आड़ में हर दिन झुलसती बालायें तो पुत्र प्रेम की अभिलाषा में चोरी छिपे भ्रूण में कत्लेआम होती नन्ही कलियां आज समाज से अपनें अस्तित्व को बचानें के लिए न्याय मांग रही है। इस तरह से महिलाओं के प्रति जघन्य अपराध का होना अपनें पीछे कई सवालियां प्रश्न छोड़ रहे है। जिन पर आज गहन मंथन की आवश्यकता है। 


महिलाओं को समाज में सम्मान व न्याय दिलानें के लिए महिला आयोग, सरकार और अन्य जागरूक संस्थाओं के प्रयास सराहनीय तो है परन्तु आज इस तरह के जघन्य अपराधों पर पूर्णतया अंकुश लगानें की महती आवश्यकता है। जिससें बेटियो को एक सुरक्षित आकाश मिल सके तथा समाज में छिपे सफेद पोशधारी अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके तांकि फिर कोई इस तरह के जघन्य अपराध के बारे में सोच भी न सकें। 


इस प्रकार से जुड़े न्यायिक मामलों में जल्द सुनवाई की व्यवस्था स्पष्ट्र एवं पारदर्शितापूर्ण होनी चाहिये, जिससें लोगो में न सिर्फ न्याय पालिका के प्रति विश्वास बढ़ेगा बल्कि अपराधियों को जल्द से जल्द सजा भी मिल सकेगी। जिससे बढ़ते हुयें अपराधों में लगाम लग सकेगी। 


लेखक
गौरव सक्सेना

Gaurav Saxena

Author & Editor

0 Comments:

Post a comment

Please do not enter any spam link in comment Box