गौरैया कहीं किताबों में सिमट कर न रह जायें।

 गौरैया कहीं किताबों में सिमट कर न रह जायें।

गौरैया कहीं किताबों में सिमट कर न रह जायें।

                     बढ़ती इन्सानी हलचल और प्रकृति के प्रति पनपती बेरुखी आज परिन्दों के जीवन के लिए अभिशाप बन गयी है। जहरीली होती हवाएं और संचार टावर से उत्सर्जित रेडिएशन से कई पक्षियों की नस्ल समाप्त हो गयी है। और कुछ पक्षियों की घटती आबादी एक दिन इन्हे इतिहास का हिस्सा बना देगी। ऐसी ही कुछ स्थिति है घरेलू गौरैया की है, जो कभी हमारे चौबारे की शान हुआ करती थी, और घरों पर अनाज के पर्याप्त दानों से अपनें पूरे परिवार का पेट भरा करती थी। यह चिड़िया इन्सानों के साथ घुल-मिलकर घरों में घोसलें बनाकर रहती थी। परन्तु अब वक्त और इन्सानी सोच दोनो ही बदलते जा रहे है।


                    ए.सी. पर आश्रित होती जिन्दगी नें घरों की खिड़कियों और दरवाजों को गौरैया के लिए बन्द कर दियें है। घरों की बालकनी अब इन्सानों के लिए वस्त्र सुखानें के लिए प्रयोग की जानें लगी है। गौरैया के घोसलों को बननें से पहले ही घरों की स्वच्छता के नाम पर उखाड़ कर फेंक दिया जाता है। पहले कच्चे तथा लकड़ी के घर होते थे, जहॉ इन्हे अनुकूल वातावरण व तापमान सुलभ हो जाया करता था। परन्तु वहीं आज अनुकूल वातावरण के अभाव में यह बेहद खूबसूरत चिड़िया दम तोड़ रही है।  


                 गौरैया की निरन्तर घटती संख्या एक चिन्तनीय विषय है जिसपर यदि समय रहते ध्यान नही दिया गया तो हम इस खूबसूरत पक्षी को सदैव के लिए खो देगे और केवल इन्टरनेट और किताबों के पन्नों में ही देख पायेगे। वर्तमान समय में ग्रामीण क्षेत्रों में तो हम इस पक्षी को देख भी सकते है परन्तु शहरों से यह विलुप्त हो चुकी है। जिसका सीधा कारण इनकी मानवीय अपेक्षा ही है। 

  
                आहार में कमी, अनाज में बढ़ते कीटनाशक के प्रयोंग, मोबाइल टावरों की बढ़ती संख्या इनके जीवन के लिए संकट बनते जा रहे है। गौरैया प्रकृति के संरक्षण में अपनी एक बड़ी भूमिका निभाती है जो हानिकारक छोटे- छोटे कीड़े मकोड़ो को खाकर प्राकृतिक सन्तुलन बनानें तथा प्रकृति को स्वच्छ बनानें में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है। 


                 इनके संरक्षण के लिए हम सभी को आगे आना होगा जिसके तहत हमें अपनें घरों में इनके लिए फिर से एक कोना संरक्षित करना होगा। इनके लिए लकड़ी, जूट, बांस की टहनियों इत्यादि से घोसले बना कर उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करना होगा ताकि यह किसी अन्य हमलावर पक्षी के शिकार होनें से बच सकें। घरों की बालकनी तथा लॉन में पौधों को लगाकर इनके लिए उपयुक्त तापमान देना होगा। भीषण गर्मी में इनके लिए मिट्टी के पात्रों में जल भरनें की प्राचीन आदत को फिर से अपनाना होगा ताकि जल के अभाव में इनके कंठ न सूख सकें, और यह जीवित रह सके। तभी इनकी मधुर कर्णप्रिय आवाज हम सभी को मंत्रमुग्ध कर पायेगी। 

उक्त लेख को देश के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र "जनसत्ता" नें दिनांक 22 सितम्बर 2020 को अपनें समाचार पत्र में प्रकाशित किया।

गौरैया कहीं किताबों में सिमट कर न रह जायें।



समाजसेवी एवं लेखक
गौरव सक्सेना


बेजुबान परिन्दों के लिए भी कुछ सोचियें.................

गौरैया कहीं किताबों में सिमट कर न रह जायें।


Gaurav Saxena

Author & Editor

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