हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख

 हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख

हर किसी के वश का नही रहा योग – व्यंग्य लेख


पूरे देश में योग दिवस की तैयारियां जोर- शोर से चल रही है। जोर से अभिप्राय है कि हर एक दुबला – पतला व्यक्ति अब जोर लगा कर श्वास को अन्दर बाहर खींचनें कर अभ्यास करनें लगा है ताकि योग दिवस पर वह अपनें योग का उत्तम प्रदर्शन कर सकें तथा शोर से अभिप्राय यह है कि अब बिना किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र के आम लोगो को योग के लिए मैदान पर दिशानिर्देश दियें जायेगे। शहर के अन्य महनीय लोगो की तरह मैं भी इस समय श्वास को जोर – जोर से अन्दर बाहर करनें का अभ्यास कर रहा हूं। क्योकि योग के जानकर बताते है कि यह सिर्फ करनें से होता है। इसलिए करना जरूरी है। मैनें अपनें चेला कनचप्पा को इस योग दिवस के लिए विशेष रूप में ट्रेनिंग दे रक्खी है कि पिछली बार चूंके सो चूंके लेकिन इस बार कोई चूंक नही होगी। योग दिवस पर मेरी योग करते हुयें फोटो सभी अखबारों की मुख्य हेडिंग होनी चाहियें। तथा योग करनें के बाद मैं एक स्वरचित कविता का काव्य पाठ करूंगा। जिसें सभी टी.बी. चैनल अपनें प्राईम टाईम में चलायेगे। मेरे दिशानिर्देश कनचप्पा के लिए कोई अध्यादेश से कम नही होते है। वह अब काफी समझदार हो गया है और उसनें मुझे आश्वस्त भी कर दिया है कि इस बार शहर में योग दिवस पर मेरा ही योग श्वास भरेगा। 

योग दिवस के दिन मैं सुबह तड़के ही अपनें चेला कनचप्पा के साथ योग करनें के लिए निकल पड़ा। मैदान पर जाकर देखा तो पता चला कि मुझसे पहले नेता जी नें मैदान को घेर रखा है औऱ मेरे बुलायें आदमी भी नेता जी की चिकनी चुपड़ी बातों में फसकर नेता जी के साथ बैठकर पेट फुला रहे है अर्थात योग कर रहे है। मैं इस प्रकार की अव्यवस्थता देखकर कनचप्पा पर क्रोधित होनें वाला ही था कि वह बोल पड़ा कि कविवर आप परेशान न हो। बगल वाला मैदान छोटा जरूर है लेकिन उसकी अपनी एक अलग महिमा है। इतिहास गवाह रहा है कि इस मैदान पर होनें वाले आयोजन कभी विफल नही हुयें है और रही बात भीड़ जुटानें की वह आप मुझ पर छोड़ दीजियें। मैं कनचप्पा की बात मानकर बगल वाले मैदान में योग करनें लगा, पता नही कनच्प्पा नें लोगो के कान में क्या मंत्र फूका की नेता जी की योग सभा से उठकर लोग मेरी योगसभा में आनें लगे। तभी कनचप्पा मुझसे बोला कि कविवर आप और तेज गति से श्वास लेकर जोर-जोर से योग करें तथा योग में कुछ करतब भी दिखायें जिससे बगल वाले नेता जी आपके सामनें योग में फीके पड़ जायें और आपकी जय-जयकार हो। मैनें भी अपनी पतली पसलियों को साधते हुयें जोर – जोर से श्वास अन्दर बाहर करना शुरू किया तो लोग तालियां बजानें लगे। फिर मैं करतब दिखानें के लिए सिर के भर उल्टा होकर शीर्षासन करनें लगा कि अचानक से मेरी पतली पसलियों नें धोखा दे दिया औऱ मैं भयकर दर्द से चिल्ला पड़ा। अचानक से मैं जमीन पर गिर पड़ा और फिर जब आख खुली तो स्वंय को अस्पताल में पाया। पास में डाक्टर, नर्स औऱ आंख छिपाता कनचप्पा खड़ा था। मैं कनचप्पा से कुछ बोलता इससे पहले ही उसनें मुझे एक अखबार में छपी खबर दिखायी जिस पर लिखा था कि हर किसी के वश का नही रहा योग। मैं कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता उससे पूर्व ही नर्स नें एक इंजेक्शन मेरी कमर में जड़ दिया। और मैं फिर दर्द में अपनी योग पर लिखी कविता गुनगुनानें लगा। आखिर गुनगुनानें से ही तो कविता कालजयी बनती है। 


लेखक 

गौरव सक्सेना

354 – करमगंज,इटावा

उक्त लेख को दैनिक समाचार पत्र "देशधर्म" नें अपनें 19 जून 2022 के अंक में प्रकाशित किया है। 



Gaurav Saxena

Author & Editor

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