आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप

 

आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप


                                                    आज बन्धुत्व का बदलता स्वरूप


अरे बेटा रामलाल, जल्दी उठो और खेतो पर जाकर पानी लगा आओ। वैसे भी इस बार की फसल आवारा पशु ही चर गये है। कई बार तुझसे कहा है कि खेतो पर एक मचान बनवा दो, रात में मैं ही खेतों पर सो लिया करू, कम से कम फसल तो बचेगी। लेकिन तुम्हे तो अपनी नींद और फोन से ही फुरर्सत कहॉ है।
अरे बापू, क्या आपनें तो मेरी नींद खराब कर दी है, और छोटू क्या करता रहता है वह ही खेती वाड़ी का काम देखा करें, मुझे यह खेत-खलियान का काम अच्छा नही लगता है। 


तू बस छोटू से ही चिढ़ता रहना, 2-2 बच्चों के बाप हो गये हो और जरा सी भी समझ नही आयी, अपनें छोटे भाई को तुम हमेशा दुश्मन की निगाह से ही देखते हो। और वह छोटू की उदारता देखों बेचारा दिन-रात ट्यूशन पढ़ाकर पूरे घर का खर्चा चलाता है।

ठीक है बापू, आप तो सदैव छोटू का ही पक्ष लेते हो।
तभी गॉव के जमींदार दीना का आना हुआ, अरे काका क्या बात-चीत हो रही है रामलाल सें।
अरे, कुछ नही घर गृहस्थी की बाते है और क्या, काका नें गृह क्लेश की बातों को ढ़ाकते हुये कहा....
सब ठीक-ठाक तो है ना घर में, जमींदार दीना नें पूछा ?


हॉ सब कुशल मंगल से है। तुम सुनाओ, आज सवेरे- सवेरे कैसे आना हुआ।
अरे कुछ नही काका किराये पर ट्रैक्टर कर रहा था, फसल को शहर जाकर बेंच आता।
तो सोचा कि काका आप से भी पूंछ लूं, आपको भी फसल बेचनी हो तो हम दोनो लोग मिलकर ट्रैक्टर का खर्चा आपस में आधा- आधा बांट लेगे तो मुझे भी थोड़ी राहत मिल जायेगी।
अरे, बिल्कुल दीना तुमने ठीक सोचा। मै अभी तुम्हे कुछ पैसे दे देता हू बांकी फसल बेंचकर उसी दिन दे दूगा।
कोई बात नही काका, घर पर जो थोड़ा बहुत पड़ा हो वहीं दे दो।
तुम यहीं रूको मै आता हूं..........


काका नें बरामदे में जाकर रामलाल को बात बतायी और रामलाल से कुछ रूपये दीना को देनें के लिए मांगे, तो स्वभाव के अनुरूप रामलाल आना-कानी करनें लगा, बड़ी मुश्किल से उसनें पैसे अपनें बापू को दियें, क्योकि वह चांह रहा था कि इसके पैसे भी उसका छोटा भाई ही खर्च करें परन्तु छोटा भाई आज घर पर नही था वह रेलवे की परीक्षा देनें शहर गया था।    


यह लो बेटा दीना कुछ रूपये लेकर ट्रैक्टर वाले को अगले हफ्ते सोमवार को बुला लो। तुम्हारे साथ यह दोनो भाई भी शहर जाकर फसल बेंच आयेगे। वैसे भी इस बार तो ना के बराबर फसल हुयी है।  
हा काका चलता हू सोमवार को भुरारे (सुबह) ही आ जाऊंगा।
रामलाल भी बेमन से उठकर खेतो पर पानी लगानें चला गया............ 


अगले हफ्ते रामलाल नें ट्रैक्टर वाले के आनें से पहले ही जान-बूझकर उसी समय अपनें छोटे भाई को बहाने बनाकर गॉव के मास्टर जी के पास भेज दिया कि उनके पास से मिठाई (गुड़) ले आओ....
छोटे भाई के जाते ही ट्रैक्टर वाला आ गया, अब क्या रामलाल ने दीना की मदद से अनाज ट्रैक्टर में डाला और शहर को रवाना हो चला ...


दीना के पूछनें पर उसनें कहॉ कि छोटू जरूरी काम से गया है पीछे से आता होता, मंडी में ही मिल जायेगा।
छोटू मास्टर जी के घर से वापस लौटा तो पता चला कि उसका भाई फसल लेकर ट्रैक्टर से शहर चला गया। निराश हो छोटू कुछ दूर पैदल चलकर तो कुछ दूर अन्य राहगीरो की साईकिल पर बैठकर जैसे-तैसे मंड़ी पहुंचा तो दोपहर हो चुकी थी तब तक उसका भाई रामलाल फसल बेंच भी चुका था, क्योकि रामलाल की चालाकी तो जग जाहिर थी। 


शाम को भी वापसी में रामलाल नें फिर नयी चाल चली कि छोटू तुम सब्जी लेकर आऔ हम मंड़ी चौराहे पर तुम्हे मिल जायेगे, तब घर चलेगे। छोटू अपनें भाई की चालाकी को अच्छी तरह समझता था लेकिन घर में शांति रहे, इसलिए कड़ी मेहनत करता था और अपनें भाई से भी किसी भी प्रकार की तर्क-वितर्क नही करता था। क्योकि उसे अपने खडूस भाई का व्यवहार अच्छी तरह से पता था। आज सुबह ही उसकी चालाकी का शिकार छोटू हो चुका था। बाजार में सब्जी खरीदनें में छोटू को कुछ समय अधिक लग गया। 


खैर छोटू सब्जी खरीदकर चौराहे पर पहुंचने वाला ही था कि रामलाल ने दूर से ही छोटू को आते देख दीना से बाते बनाकर बोला कि पता नही छोटू कहॉ रह गया, देर हो रही है।
जरूर अकेले में चट्टा चपट्टा खा रहा होगा। चलो दीना भाई ट्रैक्टर आगे बढ़वाओ, नही तो घर पहुचंते रात हो जायेगी। छोटू कोई सवारी से आ ही जायेगा।
दीना रामलाल की चालाकी को नही समझ पाया और वह ड्राईवर के बगल वाली सीट पर बैठकर ट्रैक्टर में तेज बजते गानों का आन्नद लेनें लगा। 


ट्रैक्टर धीमे- धीमें बढ़नें लगा, और पीछे उसकी ट्राली में अकेले बैठा रामलाल खुश था, क्योकि वह चाहंता था कि उसका भाई ट्रैक्टर में ना बैठे, क्योकि ट्रैक्टर के किरायें में पैसे सिर्फ रामलाल नें खर्च किये थे, रामलाल की मानसिकता कितनी संकीर्ण हो सकती है इसका अन्दाजा भी नही लगाया जा सकता। 


पीछे भागते हुये छोटू नें ट्राली को लपक कर पकड़ कर चलते ट्रैक्टर में चढ़ना चाहा तो रामलाल नें अपनी दुष्टता का परिचय देते हुये उसका हाथ इस अन्दाज से पीछे झटक दिया कि उसका यह कृत दीना और ड्राईवर भी न देख सकें। और ट्रैक्टर अपनी गति से बढ़नें लगा। 


बेचारा छोटू पैदल ही घर के लिए चल दिया और पीछे मुड़कर अन्य सवारी को देखता कि कोई सवारी मिल जाये तो समय से घर पहुंच जायें। क्योकि उसके गॉव तक इक्का-दुक्का ही वाहन चलते थें। और शाम को सवारी भी नही चलती थी। 


छोटू के लिए उसके भाई का स्वभाव कोई नयी बात नही थी, और वह अपनें भाई के बुरे आचरण का आदी भी हो गया था। तकरीबन घन्टे भर के पैदल सफर नें छोटू को थका डाला था। तभी अचानक छोटू की नजरों नें देखा कि वहीं ट्रैक्टर कीचड़ में फसा है और उसका भाई रामलाल, दीना और ड्राईवर तीनों मिलकर उसे बाहर निकालनें की असफल कोशिश कर रहे है। पास पहुंचनें पर दीना बोला- अरे छोटू कहॉ रह गये थे, क्या सब्जी लेनें लगे थे, हमनें तुम्हारा इन्तजार भी किया तुम्हे देर लग रही थी, इसलिए हम लोग गॉव वापसी के लिए निकल पड़े।
चलो कोई बात नही, छोटू नें कहा। 


दीना बोला कि छोटू तुम मदद करों तो यह ट्रैक्टर निकल सकें और हम लोग समय से गॉव पहुंच सकें।
छोटा नें हस कर कहा – बिल्कुल मैं मदद करता हूं.....
थोड़ी देर की मेहनत और छोटू की सूझबूझ से ट्रैक्टर कीचड़ से बाहर आ गया तो दीना नें छोटू से पीछे ट्राली में बैठनें को कहा।


छोटू अपनें भाई रामलाल के सामनें पीछे ट्राली में बैठ गया। दोनो भाई शान्त थें।
रामलाल अपनें छोटू को चुपचाप देखता जा रहा था, शायद अब उसके पास कुछ बोलनें को था भी नही..........................
शायद रामलाल अपनें कृत्य पर शर्मिन्दा था और पश्चाताप कर रहा था..............
रिश्तो से प्रेम कब समाप्त हो गया पता ही नही चला, लेकिन शायद छोटू जैसे भाईयों की उदारता अब भी दिलों में जिन्दा है।

लेखक
गौरव सक्सेना


 

 

 


Gaurav Saxena

Author & Editor

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